कथेतर

श्याम बेनेगल की फिल्मों में स्त्री की भूमिका

दिल्ली में जन्मी युवा लेखिका बालकीर्ति ने एम. एड. की शिक्षा प्राप्त की है, उनकी रचनाएं विविध पत्र-पत्रिकाओं यथा अलाव, समकालीन अभिव्यक्ति, माटी, वाणी समाचार, माध्यम, कथादेश में प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘कला वसुधा’ में रंगमंच पर लेखन कर चुकी हैं और ‘स्त्री दर्पण’ तथा ‘पहली बार’ ब्लॉग्स के लिए अनुवाद कार्य। उन्हें साहित्य समर्था श्रेष्ठ कहानी पुरस्कार, सीवी रमन साइंस फिक्शन ट्रॉफी, कथादेश लघु कथा प्रतियोगिता पुरस्कार, साहित्य समर्था कविता प्रतियोगिता  पुरस्कार, सावित्रीबाई फुले सम्मान जैसे पुरस्कार/सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। संप्रति स्वतंत्र लेखन  

बालकीर्ति ने अपनी एक अलहदा भाषा विकसित की है, जिसमें केवल शब्दों का नवाचार ही नहीं बल्कि एक अनूठी तरलता है, जो चिंतन की एक विशिष्ट तंद्रा की छाया सी लगती है। श्याम बेनेगल की फिल्मों पर यह कोई पहला आलेख नहीं है लेकिन अपनी तरह का पहला ज़रूर है। 

"इस पंछी को क्या कहते हैं?" "यहां इसे वडलापिटा कहते हैं।"

यह निर्देशक श्याम बेनेगल निर्देशित फिल्म अंकुर के संवाद की एक पंक्ति भर नहीं है,  यह पंछी है जिसे श्याम बेनेगल की स्त्री और पुरुष दोनों सुनते हैं, एक कुशीलव की तरह और श्याम बेनेगल की नायिकाओं को आज की स्त्री की तरह एक कुशीलव चाहिए। पति,  प्रेमी या पुरुष की आधिकारिक सत्ता का ढोल पीटता नकारा नहीं अपितु एक कवि, एक चारण, एक नाटक खेलने वाला, एक गवैया, एक वार्ता प्रसारक एक संवाददाता, एक गप्प हांकने वाला हलचल मचाने वाला किंतु स्त्री के भावनात्मक संसार में एक ऐसा संगीत प्रसारित करने वाला सुभग जिसे साक्षी जान, मान वह अपना मन खोले, पति की इच्छा ज्ञान और क्रिया कोष में अपनी इच्छा कामना उद्दीप्त आवेगों को उसकी हिंस्र अग्नि में रूंधने वाली अरुंधति मात्र ना रह जाए!

इसीलिए श्याम बेनेगल के नायक मर्द नहीं पीठमर्द (नायिका के मानमोचन में समर्थ नायक के सहायक उपनायक) भी हो सकते हैं, जिनसे उद्दंड नायिका भूमिका की स्मिता पाटिल की तरह ठेंगे का अनुबंध कर सकती हो। जैसा वह केशव दलवी या अमोल पालेकर के साथ करती है जब वह बार-बार उससे पूछता है: “कसम खा! बोल! तू मुझसे शादी करेगी!”

और उसका जवाब है, “मैं तुमसे ठेंगा करेगी ठेंगा” और जब वह उससे बचकर सीढ़ियों को हिरनी सा फलांगती निकल भागेगी तब पृष्ठभूमि में मराठी हलगी ज़ोरदार दस्तकों से किसी ऐलान की तरह बजती होगी। श्याम बेनेगल की स्त्री, स्त्री की विविध भूमिकाओं में विचरण करती हुई और उन्हें हिरनी सा चौकड़ी भर फलांगती हुई पुरुष के लिए सदैव ही एक ईहा मृग है।

या फिर अगर उसे निशा के अंत की तरह आना है तो पोतराज की कड़क लक्ष्मी की तरह आना होगा जिसके देवल की घंटी साधते विष्णु पति के जिस्म पर जब उसके अपने खूंखार नृत्य के ही सधे चाबुक पड़ते हों तब भी उसे बिना रुके निरंतर ढोल बजाते रहना है जैसे कि निशांत की सुशीला। जो स्कूल मास्टर पति गिरीश कर्नाड के घर से बड़ी हवेली के गुंडे जमींदार भाइयों द्वारा रातों-रात अपहृत कर ली गई है! और इसकी गवाही देने वाला गांव में कोई भी नहीं है।

उस दृश्य में जहां अपने नन्हे मुन्ने के लिए खाना पकाते या उसका मल साफ करते हुए पिता एक अपहृत मां की अनुपस्थिति में अपनी अपहृता गृहस्थी को देखता सा बस रो ही नहीं पड़ता पृष्ठभूमि में हंटर वाले नृत्य का ढोल साफ सुनाई देता है। स्त्री मां होकर भी जमींदारों की सामंती जकड़न में दिन रात तब तक बलात्कृत होती रहेगी जब तक उसका पति पुजारी को नहीं जगा देता पुजारी जो देवल में जमींदार के ही एक भाई विश्वम द्वारा चोरी लूटपाट के एक साक्ष्य लॉकेट को लेकर बैठा है, विश्वम जिसने बस एक नजर ही तो देखा था मास्टर की जोरू सुशीला (शबाना आज़मी) को और उसका इस कदर दीवाना हो गया कि पहली बार अपने भाइयों की तरह उसने स्त्री को अपहृत कर उसका मानमर्दन करने की सोची।

लेकिन सच में वह उसे प्रेम कर बैठा। कुछ इस हद तक के जब मास्टर सारे गांव वालों को जागरुक कर जमींदार की जड़ उखाड़ने पूरे गांव से जत्थे के जत्थे भीड़ इकट्ठी कर लाएगा और नासमझ भीड़ बेकाबू होकर जमींदार के साथ-साथ सुशीला और विश्वम के खात्मे के लिए भी दिगंत कंपाती हुंकारा भरती आगे बढ़ रही होगी, विश्वम अपनी पत्नी रुक्मणी (स्मिता पाटिल) की बजाय सुशीला का हाथ कसकर पकड़ेगा और ले जाएगा, उसे भीड़ से बचाते हुए उस गोलाश्म तक जिस ऊंचे शिलाखंड पर पूरी दुनिया से कटते हुए विश्वम उन दो सुंदर भोले ईहामृग नयनों में खोता हुआ अपना नाक उसके कांधे गाड़ता हुआ मृत्यु से ठीक पहले उसे जिंदगी के आखिरी घूंट की तरह पाना चाहेगा वह अपने से भी दूर अपने मुन्ना में खो चुकी होगी कहती हुई, “वजह मालूम होने से मौत आसान हो जाएगी क्या?”

यहां पर नाटकीयता से प्रतिपल बढ़ती और भारी होती जाती भीड़ मानो एक समवकार में प्रविष्ट हो चुकी है: एक भगदड़ मच चुकी है जो चेतन अवचेतन और उन दोनों के बीच एक क्लैश सी उभरती हुई दोनों पर ही पैर रखती हुई अब आगे बढ़ती जा रही है और श्याम बेनेगल ने इसे एक व्यायोग की तरह साध लिया है औचक एक ऐसे रूपक में तब्दील जिसमें युद्ध स्त्री के लिए हरगिज नहीं लड़ा जाता और यही तो विडंबना है! सभी युद्ध जो स्त्री की नियति को बदलने का दावा करते हों वास्तव में स्त्री से ही विमुख होकर उसे पद दलित कर जाते हैं!

यह कितना विडंबनात्मक है मास्टर जी ने गांव वालों को इस तरह तैयार किया था कि उनकी सोच बदले उनके हृदय में स्त्री के लिए करुणा का उदय हो लेकिन उस गोलाश्म की ओर जिस पर विश्वम और सुशीला ने आखिरी पनाह ली है,  लाठी लेकर बढ़ती हुई भीड़ या लिंचिंग मॉब में कहीं भी स्त्री के लिए न करुणा है ना चेतना।

श्याम बेनेगल कितनी खूबसूरती से यह दिखा पाए हैं स्त्री के लिए लड़े जाने वाले हर युद्ध में पर्सपेक्टिव इस कदर बदल जाता है के दृश्य में एक बार फिर स्त्री किसी को दिखाई ही नहीं देती! इसीलिए शाम बेनेगल की नायिकाएं भी ऐसे असंवेदनशील और अशिष्ट समाज के लिए लौंग वाला बीड़ा पान सजाती हैं जैसे कि भूमिका की ऊषा (स्मिता पाटिल) गाती है बिना लौंग पान क्या खाना!

स्त्री द्वारा समाज की जोर जबरदस्ती वाली मुक्का लात अदालत में कसम खाई जाती है लेकिन ऐसे मन बेमन से! कसम जो आधी खाई जाती है पूरी तोड़ी जाती है, कसम जो आधे मन से खाई जाती है पूरे मन से तोड़ी जाती है। इसीलिए आक्रोश से धड़कती आँखें लिए स्मिता ऐलान कर ही जाती है, “मैं कसम खाती हूं मैं जो चाहूंगी वही करूंगी।

स्मिता के लिए एक जगह किसी ने लिखा कितना ट्रांसपेरेंट फेस है उनका, कितनी घुटन जैसे जिंदगी सिर्फ इसी ने जी है। श्याम बेनेगल की नायिकाएं अपनी आंखों की दक्षिणाग्नि से ऐसी ही शपथ उठाती हैं। कसम तोड़ती हुई श्याम बेनेगल की नायिका कसम से क्या एक अलहदा क्रांति नहीं करती? और यह भी क्या कम विलक्षण है कि एक प्रतिपल दुर्बोध होता जाता तानाशाह समाज नाल की ताल ठोंकता स्त्री से कसम खाने की सहनशीलता चाहता है, आखिर एक स्त्री को कब तक और कहां तक कसम खानी होगी? जैसे भूमिका की उषा अपनी मां की प्रेमी के लिए असुरक्षा की भावना को कसम खाकर भी दूर नहीं कर सकती प्रेमी जो मां के साथ-साथ पुत्री की पीढ़ी में भी निरंतर प्रेमी ही बना हुआ है! तब क्या ऐसे प्रेमी के साथ अपनी इच्छा से हम बिस्तर होते हुए स्त्री टके के भाव अपना शील गंवा देती है? या शील गंवाने के भी कुछ मानीखेज मायने हैं?

इसके लिए श्याम बेनेगल की फिल्मों में छोटे से छोटे संकेतों को समझना होगा। भूमिका फिल्म की उषा या स्मिता पाटिल जब यह देखती है कि किस तरह अमोल पालेकर उनके परिवार को उसकी आजी को संभालता है लेकिन फिर भी मां कभी उसे पूरे मन से स्वीकार नहीं करती और केवल वैवाहिक जीवन को ही अपने घराने की तुच्छता पर लगे कलंक को धोने का एकमात्र उपाय जानती है और इस पर भी अमोल पालेकर के साथ स्मिता को बयाहने के लिए तैयार नहीं उसमें कितने ऐब हैं वह उम्र में बड़ा और जाति से बाहर का है।    

तब स्मिता ही उन्हें याद कराती है मां तुमने जब उससे हर पल मदद ली तब यह सब विचार नहीं किया? इसीलिए स्मिता कुंती की तरह ही अमोल के सूर्य का आहवाहन करती है और लाड बरसाती उसकी बईंया गहती उसी में अस्त हो जाती है, ताकि भवित्व्य का कर्ण मां के ओछे आक्रमणों में उसका कवच और कुंडल बने और वह मां को खबर करती है कि अगर अमोल से शादी नहीं हुई तो मेरे पेट का बच्चा बिना बाप का कहलाएगा।

श्याम बेनेगल की नायिकाएं पेट में बंधुल संतानों को अंकुर सा धारती धारित्रि हैं, लेकिन गुत्तिल की वीणा की तरह कोई उन्हें साधता एक एक कर उनके सात तार तोड़ता जाता है अंततः काष्ठदंड जितनी ही उनकी बची हुई देह में कोई किश्टईया या कोई केशव आत्म विहीन होती जाती बेसुध उंगलियों से झंकार भर देता है।

हां ये अंकुर फिल्म का ताड़ी पीने वाला मुक्का या मूक बधिर किश्टईया (साधु मेहर) या फिर सुपरस्टार बीवी का पल पल रेट बढ़ाता, बीवी की कमाई पे पलता हरामखोर ठप्प बिजनेस व्यापारी दलवी भला कैसे और क्या ही गुत्तिल से साम्य रखेंगे?

ऐसा नहीं है वास्तव में वे अपनी अपनी तरह स्त्री जीवन की दुष्कर वीणा को साधते हैं। जैसाकि अंकुर फिल्म को अति सरलता से या जल्दबाजी में समीक्षित किया जाए तो जमींदार के बेटे अनंत नाग या सूर्या या छोटे मालिक द्वारा अपमानित किए जाने पे घर छोड़ के जा चुका गाड़ीवान किश्टईया जब अंजुली में कमाई लिए लौटता है और नोटों भरी अंजुली कातर आंखों से लक्ष्मी के आगे फैला देता है तो फटी फटी आंखों से सुबह के करिश्मे की तरह अपने पहलू में अपने पति को लंबे अरसे बाद पाती लक्ष्मी कुछ भावविभोर कुछ पति से बेबफाई, उसके साथ अपने विश्वासघात को स्मरण करती एक अवैध अंकुर को कोख में लिए जब उस घनघोर दुर्वह दुख और परम संकट की बेला में जब की छोटे साहब सूर्या ने उसे अपनी गौना कराके लाई दुलहन के साथ मिलकर घर से धक्के मारकर बाहर कर दिया है धरती पाताल को एक करता विलाप करती है तो किश्टईया उसकी कलाई पकड़कर देवल में माथा टिकाने ले जाता है तब इसे इस तरह भी दर्शक समझ सकता है के किश्टईया को लगता है के बच्चा उसका है जिसका बीज 9 माह पूर्व लक्ष्मी की कोख में छूट गया होगा जब उसने घर छोड़ा। लेकिन लक्ष्मी की देह में फूटा यह अंकुर उसका अपना बच्चा नहीं है किश्टईया यह बात समझता है क्योंकि संतान उत्पत्ति के वह नाकाबिल है फिल्म के बिल्कुल आरंभ के दृश्य में कीर्तन वाले अनुष्ठानिक जलूस में जब लक्ष्मी दोनों हाथ जोड़े ईश्वर से एक अदद अंकुर के लिए प्रार्थना करती है :मेरे को कुछ नहीं होना मां मेरे को बच्चा होना उसी समय किश्टईया मुंह छिपाता घबराता सा दृश्य के एक रहस्यमय कोने की ठंडी काली छाती पर खूब व्यग्रता भरे असमंजस से हाथ ऊंचा उठा जमीन पर पटक कर एक नारियल फोड़ता है।

वापस लौटा किश्टईया एक पल की भी देर किए बिना लक्ष्मी के पेट में पल रहे अवैध अंकुर को अपनी निश्छल छांह  कर देता है और लक्ष्मी को माथा टिकाने ले जाता है के उनके जीवन के बीहड़ से एक अदद अंकुर फूट कर आत्मा के समस्त क्लेश हरने आ चुका है। यहां यह आकुल व्याकुल वामन देवल में मानों तीन कदमों में ही त्रैलोक्य विजय कर लेता है। जब वे मंदिर की ओर बढ़ रहे हैं जुलूस की वही मनो मुग्धकारी सर्वस्व हर लेने वाली काम्य धुन बजती है जो फिल्म के प्रारंभ में बजती है यह अनुष्ठानिक धुन ऐसी है जैसे अति विह्वल सजल बिना किसी प्रश्न के उत्तरोत्तर अधिक निश्चयात्मक और करुण होती जाती किसी सुख कारक प्रलयंकारी जगरनॉट में खींचती जाती हो।

मूक बधिर किश्टईया पंचशिव गंधर्व की तरह सूर्यवचसा के अन्यत्र रम जाने की करुण वेदना को अपने गाड़ीवान वाले डांड की वीणा पर इस तरह साधता है कि उसके जिस्म पर पढ़ने वाला छोटे मालिक का हर चाबुक बुद्ध की करुणा से लिपटे उन घोंघों से समस्वर हो जाता है जो बुद्ध के शीर्ष को ताप से बचाने अपनी मुड़ी तुड़ी कुंडल देही वीणाओं से एक दूजे में सर्वांग लय होते जाते हैं ना इधर ज्यादा झुके ना उधर।

ठीक इसी समय लक्ष्मी के हृदय में किश्टईया के लिए प्रेम का अंकुर फूटता है। पहली बार मानो वह छोटे सरकार की बहिया से छूट अपनी उस पृथक् सत्ता का अनुभव कर पाती है जिसमें वह किसी से तन्मय नहीं है। वह अब एक पृथक अग्नि है पृथक विचारना शक्ति।

“तूने मेरे मर्द को मारा” वास्तव में मोहाविष्ट नहीं है, यह लक्ष्मी के गर्भ में प्राण मय, अन्न मय, विज्ञान मय कोश वलयों का अनंत तक विस्तारित होकर फैलते चले जाने वाला अंकुरण है,  आसन्न प्रसवा नौ माह के भारी गर्भ के साथ वह इसी तरह दौड़ती है जैसे उसे एक नहीं अपितु दो-दो अंकुर रक्षित करने हों: एक उसकी संतान और एक उस संतान का वह पिता जो वीर्य से नहीं अपितु उस शिशु कपाल से एकात्मक हो उठा है जिसमें स्त्री और पुरुष की पीड़ा के सम स्वरिक सामानुभूत पुरोडाश एक साथ संस्कृत हो उठे हों, सहचर्य की सड़ी गली संकीर्णताओं को पूरी तन्मयता से सहचर्य की ही खंडित वेदी में होम करने।

इसी तरह केशव दलवी ही सा सामंती मालिक काले की कैद से ऊषा को सिर्फ एक पत्र भर लिखने पर भी आज़ाद कराता है जबकि उस समय तक पूरी दुनिया उस पर अपनी खिड़की बंद कर चुकी। समाज के सामान्य जीवन के पात्र ही श्याम बेनेगल की फिल्मों में मानो प्रकरण की तरह अपनी विशिष्टता अर्जित करते हैं उनकी नायिकाएं कुलजा निष्ठ और गणिका निष्ठ या उभयनिष्ठ हो सकती हैं। फिल्म भूमिका में छोटा सा डिम भी मानो अनुस्यूत रहता है, वहां जहां रौद्र प्रलयंकर बना राजा अपनी कामना पूर्ण चेष्टाओं से एक अबला को डरा रहा है और अजगर के मुंह जैसी मशालें आग फुफकारती हैं बेबी ऊषा उन्हें देख कर डर जाती है और केशव दलवी उसे ढांढस देता है। गुत्तिल की ये वीणा :ऊषा ठीक से बजी या नहीं का फैसला एक मशहूर अभिनेत्री ही करती है

“बेबी मुंह क्यों फुलाए हुए हो तुम्हें चुन लिया गया है।”

और उषा कार में बैठी उसके कंठ की परीक्षक इन जज साहिबा को पूर्ण आत्मविश्वास से हाथ जोड़ती केशव दलवी को भौंचक कर देती है। जिसने थोड़ी ही देर पहले कहा था, “जरा ठीक से गा लेती तो! अब चलो पंढरपुर और भजन करो हरी विठ्ठल हरी विठ्ठल!” यह दृश्य अद्भुत बन पड़ा है मानो बेबी उषा के जुड़े हुए हाथों के नाखून इस दृश्य में वयस्क हो गए हैं और वह समाज द्वारा आरोपित एक भूमिका के मछली पेट में से निकलती भी उसमें सर्वांग समा नहीं सकती।

श्याम बेनेगल की नायिकाएं इसी तरह से अपने सौंदर्य में कुछ जन्य और कुछ निवेश्य प्रकीर्ण अलंकारिकता रखती हैं। जैसे शबाना आजमी को आज बहुत समय बाद अंकुर के कई दृश्यों में अपनी भौंहें सुरुचि पूर्ण ढंग से कढ़ी हुई नहीं लगती या उन्हें लगता है कि कहीं-कहीं उनके बिना लिपस्टिक के होंठ सुंदर नहीं लगते या कई दृश्यों में उन्होंने निर्देशक से छुपकर अपने होठों पर किंचित लिपस्टिक अप्लाई की जिससे कोई बात नहीं बनी लेकिन वस्तुतः वह उस श्रम जल से बहुत सुंदर लगती हैं जिसमें कुटी हुई मिर्च लोध्र फूलों के पराग से भी अधिक मादक हो जाती है उनके गाल पर। श्याम बेनेगल की नायिकाएं गुनगुनाती हैं तो उनका मूसल या सूप,  फूंकती हैं तो चूल्हे की फूंकनी की बांसुरी भी उनके उस काम्य धीरज से तन्मय हो अपनी तीक्ष्ण प्रकृति के विरुद्ध माधुर्य का कठिन दुर्वाचक योग साधने लग जाते हैं। इसीलिए उनकी नायिकाएं भी अपनी इस प्राकृतिक रूप माधुरी से देखने वाले के हृदय में उत्कंठा और कामना का बीजारोपण कर देती हैं।

वह दृश्य बहुत ही सुंदर और कामुक बन पड़ा है जिसमें अनंत नाग शबाना से पूछते हैं क्या तुम रो रही हो। जबकि वस्तुतः मिर्च कूटने से उसकी आंखों में किंचित लालपन या मदिरामद सा खुमार आ गया है, तो क्या ये मदमाती सकल सुंदर चिर काम्या नायिकाएं ग्राम्य अप्सरा का रूप धरे अनैतिकता से स्वयं ही अपनी ईहामृग कामना में जलती हुई पर पुरुषों से आलिंगनबद्ध हो जाती हैं?

“आपको क्या फर्क पड़ता है? बदमाशों की हवेली में रखैल बनकर रह गई हूं, अब तक तो आग लगा देना था हवेली के टुकड़े-टुकड़े कर देने थे”

निशांत की यह शबाना अधिक प्रामाणिक है या फिर वह शबाना जो एक भावुक आवेश में हंटर लेकर आए विश्वम या नसीरुद्दीन शाह के साथ भावुक क्षण में हम बिस्तर हो जाती है? वास्तव में स्त्री वडलापिटा पंछी जैसी कहीं दूर से उमड़ती किसी दूरस्थ संचारी सम्मोहनी मृगतृष्णा सी पुरुष का मन नहीं जीत सकती शायद इसीलिए श्याम बेनेगल की फिल्मों में इस पंछी के साथ-साथ एक मुर्गी भी रहती है जैसे की भूमिका फिल्म की मुर्गी जिसे संगीतज्ञ उस्ताद के लिए हलाल कर दिया जाता है।

पुरुष की नपुंसक कायरता से गहरे मानसिक आघात पाई शबाना आजमी के लिए चीख चीख कर यह कह जाना तुम्हें तो जैसे शर्म ही नहीं है तुम मर्द होते तब ना मेरा सोचते। तुम्हारी पत्नी को रातों-रात उड़ा लिया गया और तुम इस तरह से हाथ पे हाथ धरे बैठे रहे भी कहीं ना कहीं उन नाजुक लम्हों को बुनता है जिसमें वह हंटर लेके आए नसीरु के सीने पर एक लड़खड़ाती विदेह निशांत सी ढल जाती है। वह अपने ही जिस्म की खाइयों से जन्मी वैदेही हो गई है यहां। वह अपने में हिरणी की आंखें, चीते की सुंदरता, ताड़ के पेड़ों की कोमलता, चंपक के फूल की खुशबू  और हंस की गर्दन पर पंख की कोमलता से घड़ी गई लोपामुद्रा नहीं।

वह सुंदरताओं से अपना भाग ग्रहण करती या उगाहती उनकी हानि नहीं करती, वह चंदन चर्चित नहीं। निशांत की विकृतियों से ग्रहणी हुई भी वह समाज की हल्की हड्डी के भीतर की फ्रैक्चर्ड लाइंस को एक्स-रे के मानिंद दिखाती है। मानो हर पीड़ा, धिक्कार, चोट, ठोकर, अवमानना, शोषण, अत्याचार इस निशांत में लोप होती उस निशाचरी निशा की हानि करती हो भोर के संदली उत्थापन के लिए!

निशांत की शबाना वास्तव में आधा युद्ध तो घर से ही जीत चुकी है। नसीरु के साथ जिस्मानी तालुखात की गहन रूहानी खूबसूरती में ही वह उसके दिल में राह कर पाई है कुछ इस कदर कि शबाना के लिए वह बड़े भाई अन्ना से अलग रसोई की मांग करने आया है और भाइयों की इस बात का जवाब भी इसी में है कि क्या तू मास्टर की जोरू से शादी करने की तो नहीं सोच रहा? तो भूमिका की स्मिता फिल्म डॉयरेक्टर सुनील के साथ एक सुसाइड पैक्ट में दाखिल होने से पहले उसे अपने को इसी तरह सौंपती है जैसे वह किसी शीघ्रवाही रथ पर जिंदगी से मौत की दहलीज और मौत से जिंदगी की दहलीज में किसी अनाम तजुर्बे के लिए दाखिल खारिज तो हुई हो किंतु एक विदूषक विलासिनी के मनोविनोद से जो सूत्रधार की टिट फोर टैट को भी अगले तजुर्बे की तरह ही ग्रहण करेगी:मेरी 40 गोलियां  टेबल के दाहिने ड्रार में है उनके साथ वो गोलियां भी है जो तुमने नहीं ली,  बहुत-बहुत प्यार सुनील

दोनों ही एक दूसरे के मिथ्या भय उतनी ही सहजता से निकालते हैं, जितनी सहजता से कार्ड बोर्ड के पेड़ के गिर्द छुईमुई कोमलता से लिपटने की प्रैक्टिस करती स्मिता पेड़ को अपने सिर पर गिरा लेती है। और जितनी सहजता से सुनील अंततः निर्देश देता है, “रिफ्लेक्टर ऑफ! पानी बंद! ट्रॉली उधर से घूम कर आएगी!” और उसी मराठी तमाशा गीत का ही, जिसमें स्मिता बार बार साड़ी के पल्लू को सर के पीछे से खींच नाग के फन की तरह धारे तमाशा की गवलण की तरह लटके झटके लगाती प्रवेश करती है, एक टुकड़ा कुछ इस तरह से है, “मैं लूंगी दूना हरजाना!”

श्याम बेनेगल में जुलूस की तरह बच्चे भी निरंतर आते हैं कभी चौंके हुए कभी चौंकाते से। अंकुर फिल्म जुलूस या प्रोसेशन से शुरू होती है जिसे एक हंटरवाला लीड करता है तो निशांत में जमींदार की रियाया जुलूस के अवतार में ही अवतार लीला करती है। अंकुर का बच्चा जो जमींदार के बेटे सूर्या के दिल के काले को सेंदी की चोरी सा ही ताड़ गया है जमींदार की खिड़की का कांच पत्थर से चकनाचूर कर देता है।

निशांत में एक बच्चा ही जुलूस के उस नृशंस कांड का साक्षी है जिसे पुजारी अपनी रामनामी चादर से ढक देता है (भीड़ निर्दोष रुक्मिणी को रौंद कर जयकारा बोलती जा चुकी है)। निशांत के अंत में भी जब दुष्टों की धर पकड़ और संहार में ही निर्दोषों का भी संहार हो रहा है बच्चे एक देवल में ईश्वर की ओर पीठ दिए जमा कर लिए गए हैं।

निशांत के मास्टर जी जब अपनी छतरी की नोक को सुनसान की हवाओं पर आक्रोशित चीत्कार से तलवार की तरह आक्रमणकारी मुद्रा में पैंतरे बदल बदल कर चलाते हैं और ऊपर एक दण्डधारी नैयायिक सा एक बच्चा गोलाश्म पर से उन पर इकटुक अवाक मुद्रा में नजरें गढ़ाए दिखता है वे उसे चेतावनी से वहां से हट जाने के लिए कहते हैं मानो कोई परांगमुख नंदी ईश्वर को कैलाश से हट जाने के लिए अंतिम चुनौती दे रहा हो।

लक्ष्मी और मूक बधिर किश्टईया के मध्य आत्मा की घनिष्ठता में विगलित, चिन्ह भाषा के संकेतों से जैसा संवाद बनता है ऐसा लक्ष्मी और छोटे मालिक या सूर्या में कतई नहीं। लक्ष्मी किश्टईया की मुक्की आत्मा में उतर उसे बंडी, उर्वरक,  ढुलाई, रसद किस तरह कायनात की एक-एक चीज को मुतमईन संकेतों में ढाल किश्टईया की मूक बधिर काली स्लेट पर हसरत से मंजूम करती चली जाती है।

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती, करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम.

निशांत के आरंभिक श्लोकों में एक है, फिल्म के प्रारंभ में जैसे-जैसे पुजारी सीढियां चढ़ता है भोर का नील चंदोवा भी तिर्यक ऊंचा उठने लगता है यह कितना सुंदर सांकेतिक है। धर्म भीरू लोगों को पुजारी रामलीला के अंत की ओर धिक्कारता है, “किस पे हंस रहे हो?”यह भी एक दूसरी तरह सांकेतिक सुंदर है कि फिल्म भूमिका के निर्माण के समय भारत में रंग का अकाल पड़ा इसीलिए श्याम बेनेगल ने पहले भूमिका को शाम श्वेत में फिल्माया और बाद में उसे  नीली तृणमणि या कहरुवा आभा दी। क्योंकि कहरुवा आरम्भ में एक पेड़ से निकला गोंदनुमा सम्ख़ होता है,  इसलिए इसमें अक्सर छोटे से कीट या पत्ते-टहनियों के अंश भी रह जाते हैं। जब कहरुवे ज़मीन से निकाले जाते हैं जो वह हलके पत्थर के डले से लगते हैं। फिर इनको तराशकर इनकी मालिश की जाती है जिस से इनका रंग और चमक उभर आती है और इनके अन्दर झाँककर देखा जा सकता है।

इसी तरह भूमिका के दृश्य भी ऐसे बन पढ़े हैं जिनमें कोई अटका हुआ सा लम्हा कोई दौड़ता फिर कर थिरा गया सा नक्श ए कदम कोई इज़्तनाब सा कोई दुश्वारी सी कोई सदा ए ज़रस कोई दिल ए पुर खूं से दूबदू सिज़्दारेज़ी, कोई ग़म ए ज़ावेदा, कोई जामे जम सा है जिसे ज़ेर-ए-आब, आला-ए-तनफ़्फ़ुस या स्नोरकेल से साहिली मर्ज़न (कोरल रीफ) के आर पार देखा जा सकता है।

श्याम बनेगल की विजन के सिनेमेटोग्राफिक दृश्य बंध को क्या पास्कल के त्रिभुज की तरह देखा जाए, जहां पंक्ति के दाहिनी और बाईं ओर सममित होने किरदार उसी उसी कैरेक्टर टोन के साथ पुनरावृत होते हैं, जैसे साधु मेहर ‘अंधाधुंध की साहबी, ‘घटाटोप को राज’ में बेबात पिटने और मार खाने वाले बलि के बकरे की तरह (अंकुर और निशांत दोनों में ही वह निरपराध पिटता है) कुलभूषण खरबंदा नारियल की मलाई को फूंक फूंक कर हजम करते कुत्सित ढपोर शंख की तरह (भूमिका और निशांत दोनों में वह अंधेर नगरी के लिए हुकूमत को दोषी ठहराता है, जबकि स्वयं भी उनके वर्चस्व के सुंभ की नारळाची ‘मलई’ चाटता है)

क्या अंकुर का अनंतनाग निशांत में बेबस स्त्री के शील हरण को अधिक घृणित तरह से अंजाम देने और उसके चीरहरण को भूमिका के राजन में अधिक प्रैक्टिकैलिटी से अंजाम देने पुनर अवतरित हो आया है। मर्दों के सिर्फ मुखौटे बदलते हैं? क्या काले की अपाहिज पत्नी जिसके लिए नजर घुमाने को सिर्फ कमरा और ये छत है अंकुर की उस सरू का ही पुनर अवतरण है जो पिछले जन्म की हर दीवार पर गुडलक के हस्तलिखित साइन बोर्ड टांगती रही है? क्या भूमिका के उषा और सुनील में निशांत के रुक्मणी और विश्वम ही बचपन के किसी किस्से का सहारा खोजते एक दूजे से एक और तजुर्बे के लिए मरने के बाद भी दोबारा आन मिले हैं। किश्टईया की सेकंड कमिंग का अनुमान लगाते अनंतनाग की पतंग के ऊपर चढ़ने की तीक्ष्ण व्यग्रता ने इस पास्कल त्रिभुज को मध्य से दो टुकड़ों में काट दिया है, जहां दुनिया के गझिन सुंदर गूढ़ संवाद मिस कोट होने के लिए मिस रीड कर लिए जाते हैं।

शायद इसीलिए भूमिका के ‘सिनेमा में सिनेमा’ वाले शॉटस (shots) बॉम्बे टॉकीज के लहराते हुए उन्वानों के परचम की तरह से अगल बगल फेहरते ही एक गीत में चलते-चलते इस तरह मोच खा जाते हैं कि ध्वनि के आईना खानों में विकृत स्वरभंगी में वाइब्रेट होते होते दृश्य की कटी पतंग की तरह ड्रॉप कर जाते हैं: ‘अग्निपरीक्षा’, क्या ये फब्ती किसी प्रेक्षणक के नाइट शो में नीच प्रकृति के नायक ने मनचलेपन से किसी औरत पर कसी है: “फुट्टा पटाखा क्या फुट्टेगां” या किसी नाट्यरासक में किसी पीठ मर्द की पीठ पर किसी रणचंडी ने धौल धप्पा किया: “मैं कोई दो कोड़ी की औरत नहीं हूं, मेरे को अपना रसोई अलग होना” 

एक उलाप्य में अस्त्र गीत का गायन संग्राम लिखती हुई स्त्री से पुरुष ने पूछा, “तुमसे ताल्लुक रखने के लिए मेरे अंदर जज्बात नहीं आने चाहिए। ये दो अलग-अलग चीज़ें हैं न?” औरत ने कंचे वाली बोतल में कंचे जैसी इत उत झूलती इस फ़िज़ूल टिप्पणी पर कोई टीका तो नहीं कि केवल उलट कर इतना भर पूछा है, “तेरी जीभ में हड्डी नहीं है क्या?”

संपर्क : 8512806394 ; email: balkirtikumari@gmail.com

अपनी टिप्पणी दर्ज़ करें

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button