कविता
30 अक्तूबर 1955 को जन्मे रुस्तम कवि और दार्शनिक हैं। रुस्तम के आठ कविता संग्रह प्रकाशित हैं, जिनमें से एक संग्रह किशोरों के लिए है। उनकी “चुनी हुई कविताएँ” 2021 में सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर, से प्रकाशित हुईं। उनका अगला कविता संग्रह जल्द ही प्रकाशित होने वाला है। उनकी कविताएँ अँग्रेज़ी, तेलुगु, मराठी, मल्याली, पंजाबी, स्वीडी, नौर्वीजी, फ्रांसीसी, एस्टोनियाई तथा स्पेनी भाषाओं में अनूदित हुई हैं।
रुस्तम सिंह नाम से अँग्रेज़ी में भी उनकी चार पुस्तकें प्रकाशित हैं। इसी नाम से अँग्रेज़ी में उनके पर्चे राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं।
उन्होंने नार्वे के कवियों उलाव हाउगे व लार्श अमुन्द वोगे की चुनी हुई कविताओं के पुस्तकाकार अनुवाद हिन्दी में किये हैं जो वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, से 2008 तथा 2014 में प्रकाशित हुए। उन्होंने तेजी ग्रोवर के साथ मिलकर एस्टोनिया की प्रसिद्ध कवयित्री डोरिस कारेवा की चुनी हुई कविताओं का अनुवाद किया है जो संग्रह 2022 में राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, से प्रकाशित हुआ। उन्होंने पंजाबी के सात कवियों की कविताओं का अनुवाद किया है जो संग्रह 2022 में सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर, से प्रकाशित हुआ। उन्होंने “कुछ अलग स्वर: अठारह समकालीन हिन्दी कवि” नामक संकलन को संचयित व सम्पादित किया है जो सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर, से 2025 में प्रकाशित हुआ। इसके अलावा उन्होंने पाँच अन्य पुस्तकों का हिन्दी में अनुवाद किया है।
वे भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला, तथा विकासशील समाज अध्ययन केन्द्र, दिल्ली, में फ़ेलो रहे हैं। वे “इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली”, मुंबई, के सहायक-सम्पादक तथा महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा, की अँग्रेजी पत्रिका “हिन्दी: लैंग्वेज, डिस्कोर्स, राइटिंग” के संस्थापक सम्पादक रहे हैं। वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली, में विजिटिंग फ़ेलो भी रहे हैं। इस सबसे पहले वे भारतीय सेना में अफ़सर (कैप्टन) भी रहे हैं।
लाल—1
आज फिर वह आयेगी
मेरी नींद में।
उसने कह दिया है!
उसकी आँखें
काली नहीं,
हरी होंगी।
सुरमा लाल।
नीले, पीले, रंग-बिरंगे बाल।
हालाँकि
मुझे पता होगा
कि वह वही है,
पर मैं उसे पहचान नहीं पाऊँगा।
लाल—2
लाल ने मुझे अपने पास बुलाया।
मुझसे बातें कीं।
फिर उसने
अपने-आप को
मुझ पर फैला दिया।
बीच-बीच में
कुछ हरे को भी आने दिया।
लाल,
हरा
और मैं
इक-दूजे को छू रहे थे।
हम
इकट्ठे थे और अलग,
अलग थे
और जुड़े हुए थे।
तीनों मिलकर
एक आकृति बना रहे थे।
लाल—3
एक वो भी लाल था
जो सड़क पर बिखरा पड़ा था।
वह एक बूँद से भी कम था।
एक मृत पक्षी वहाँ था।
मैंने ख़ुद से कहा यह लाल नहीं हरा है
और यह पक्षी नहीं पौधा है
जो खड़ा है
और हवा में हिल रहा है।
लाल—4
मैं अवशेषों की तलाश में था।
मरु में मैंने एक पत्थर को हिलाया,
ज़ोर लगाकर उलटा कर दिया।
उसके निचली तरफ़
खुदी हुई थी एक हृदय की आकृति।
वह लाल थी।
किन्हीं प्राचीन समयों से
उसके नीचे दबा रहा था
हृदय एक।
लाल—5
फूल नहीं,
एक कंकड़ वहाँ पड़ा था।
चहुँ ओर
दूर तक बस रेत थी,
और कुछ नहीं।
मैं झुका,
मैंने उसे क़रीब से देखा।
लगता था अभी-अभी
कोई उस पर
तीख़ा लाल रंग
लगाकर गया था।
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
लाल—6
उजाड़
इस पुल के नीचे
जहाँ रोज़ शाम को आकर
मैं खड़ी होती हूँ,
किसी दिन
कोई मुझसे मिलने आयेगा।
मुझे नहीं पता वह कौन होगा,
कब आयेगा,
कितने वर्षों बाद।
लेकिन रोज़ मैं,
यहीं, इसी जगह पर
करूँगी
उसका इन्तज़ार,
फिर वापिस चली जाऊँगी —
सूखा,
लाल एक गुलाब यहाँ छोड़कर।
लाल—7
तुम आओगे —
कितनी सदियों बाद? —
उजाड़ उस पुल के नीचे।
वहाँ
पड़े होंगे
सूखे हुए
लाल
गुलाब।
तुम गिन लेना उन्हें
और जान लेना
कितने दिनों तक मैंने किया था
तुम्हारा इन्तज़ार।
लाल—8
कितने शहरों,
कितने गाँवों में से होता हुआ
वह वहाँ पहुँचा,
उजाड़ उस पुल के नीचे।
तुम वहाँ नहीं थीं।
उसने
सूखा हुआ
लाल एक
गुलाब उठाया,
उसे सूँघा
और उसे थामे हुए
वहीं खड़ा रहा।
अन्तिम बार
जब मैं वहाँ से गुज़रा
एक बुत की भाँति
वह तब भी वहाँ खड़ा हुआ था।
लाल—9
कई और सदियाँ बीत गयीं।
अब मैं मात्र एक साया थी।
मेरी स्मृति में वह कौंधा
उजाड़ किसी पुल के नीचे
एक बुत की भाँति
हाथ में गुलाब लेकर
किसी समय से जो खड़ा था।
एक क्षण में मैं वहाँ पहुँच गयी।
पुल ढह चुका था।
उसका खण्डहर ही अब वहाँ बचा था।
लेकिन पतली सी एक नदी वहाँ बह रही थी
और उसमें
कुछ हड्डियाँ
और एक लाल पत्थर पड़ा था।
लाल—10
पतली सी उस नदी में
श्वेत
कुछ हड्डियों
और लाल एक पत्थर पर
अन्तिम
एक नज़र दौड़ाकर
मैं वहाँ से चली गयी।
लाल—11
चली गयी,
मैं जो बस एक साया थी।
लाल पत्थरों के पास उसकी हड्डियों को छोड़कर मैं चली गयी।
तब भी देख सकती थी कल्पना में उन्हें मेरी नज़र।
मेरी उँगलियों ने उन्हें सहलाया।
फिर मैंने उन्हें जोड़ दिया, खड़ा कर दिया पतली उस नदी के भीतर।
हाथ पकड़ कर मैं उसे बाहर ले आयी, उसके संग चलने लगी,
वह जो मात्र हड्डियाँ था
और
धूप में चमक रहा था।
लाल—12
पतझड़ का
अन्तिम,
लाल,
सूखा हुआ
पत्ता
उनके पैरों के नीचे दब गया,
टुकड़ों में बंट गया।
उसके चटकने की आवाज़
दूर-दूर तक
सुनायी दी।
लाल—13
दूर-दूर तक सुनायी दी
पत्ते की चटकने की आवाज़,
फिर वापिस लौट आयी पत्ते में,
वहाँ शान्त हो गयी।
लेकिन लाल वह ध्वनि
अब भी बज रही है
मेरे हृदय में
जैसे कि
वह अब भी घूम रही है ख़ला में।
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