ज्ञान चन्द बागड़ी प्रसिद्ध मानव-शास्त्री और लेखक हैं, वे विगत 32 वर्षों से मानव-शास्त्र और समाजशास्त्र के अध्ययन और अध्यापन में संलग्न रहे हैं। उपन्यास, कहानी, यात्रा-वृतांत, संस्मरण और कथेतर लेखन के साथ-साथ पत्र-पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन। वाणी प्रकाशन, दिल्ली से “आखिरी गाँव” उपन्यास प्रकाशित। सेतु प्रकाशन से “दिल्ली दयार” (उपन्यास), रे माधव आर्ट से “बातन के ठाठ” (कहानी संग्रह), दशनामी नागा और रेवड़वाली और अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह) प्रकाशित। आधार प्रकाशन से “सफ़र में धूप तो होगी” (यात्रा वृतांत) और संस्मरण “जो सम्भव हुआ” (संस्मरण) प्रकाशित। जनजातीय समाज, सूफ़ी दर्शन और खेलों के मानव-शास्त्र पर विभिन्न पत्रिकाओं में शृंखलाबद्ध लेखन।
लॉकडाउन ने बहुत कुछ छीन लिया था — न सिर्फ़ बाहर की दुनिया की आज़ादी, बल्कि घर के भीतर की सहजता भी।
अवंतिका और राघव के बीच कभी न खत्म होने वाली चुप्पी फैल गई थी। यह वह चुप्पी नहीं थी जो झगड़े के बाद आती है और कुछ घंटों में पिघल जाती है, बल्कि वह जो महीनों तक घर की दीवारों पर परत की तरह जम जाती है।
जब लॉकडाउन की घोषणा हुई थी, ऐसा लगा जैसे शहर की छाती पर एक भारी पत्थर रख दिया गया हो।
सड़कें खाली, ट्रैफिक लुप्त, कैफे की खिड़कियाँ बंद और मेट्रो के सुरंगों में गूंजती खामोशी — मानो किसी अदृश्य शक्ति ने रिमोट से पॉज का बटन दबा दिया हो।
पर इस थमे हुए समय में कुछ चीज़ें पहले से तेज़ चलने लगी थीं —
घरों के भीतर की आवाज़ें।
कुछ चीखें थीं, जो कभी नहीं सुनी गईं — क्योंकि वे गुस्से में नहीं, मौन में थीं।
कुछ दरवाज़े ऐसे बंद हुए, जो बाहर से नहीं, भीतर से बंद होते थे — बिना आवाज़, बिना चेतावनी।
और इन्हीं दरवाज़ों के पीछे, अवंतिका और राघव का “आधुनिक”, “संतुलित”, “खुले विचारों वाला” रिश्ता — दरारों की तरफ़ बढ़ रहा था।
कॉलेज के आखिरी सेमेस्टर में, अवंतिका और राघव की पहली बातचीत हुई थी — कैंटीन की उस गोल टेबल पर, जहाँ हर शाम छात्र कविता, करियर और क्रांति पर बात करते थे।
अवंतिका हिन्दी की टॉपर थी, आत्मविश्वासी, थोड़ी व्यंग्यप्रिय, थोड़ी संकोची।
राघव कम्प्यूटर साइंस का छात्र, शांत स्वभाव का, लेकिन बोलने पर वाजिब बातें कहने वाला — उसका पसंदीदा लेखक हेमिंग्वे था, पर अवंतिका को यही बात खटकती थी कि “वो प्रेमचंद को नहीं समझता।”
धीरे-धीरे बहसें कॉफ़ी तक पहुँचीं। कॉफ़ी से फोन कॉल तक। और कॉल, वीकेंड की बैठकों तक।
कॉलेज के बाद दोनों को अलग-अलग शहरों में जॉब मिल गई थी। पर उन्होंने इस लंबी दूरी को कभी शिकायत की तरह नहीं देखा।
“हम एक-दूसरे की उड़ान में रुकावट नहीं बनेंगे” — यह उनका आपसी वादा था।
दो साल बाद, दिल्ली में दोनों की जॉब लगी — एक ही शहर, नए सपने।
शादी का प्रस्ताव अवंतिका ने रखा — “अगर हम दोस्ती को बचाए रख सकते हैं, तो साथ जी भी सकते हैं।”
राघव हँसा था — “मैंने तो सोचा था तुम प्रोपोज करोगी भी अपनी शर्तों पर।”
दोनों ने एक सादे से समारोह में शादी करने का फैसला किया — कोर्ट मैरिज और दोस्तों का छोटा सा जमावड़ा। ना ज्यादा रीति, ना ज्यादा रिवाज़।
अवंतिका की माँ शुरू में थोड़ी असहज थीं — “लड़का तो अच्छा है, लेकिन उसके माँ-बाप की कोई भागीदारी नहीं है?”
अवंतिका ने समझाया — “माँ, ये हमारा निर्णय है। आप हमेशा कहती थीं कि बेटियों को आत्मनिर्भर बनाओ। अब जब मैंने अपने जीवन का चुनाव किया है, तो डर किस बात का?”
माँ ने कुछ नहीं कहा — पर जब विदाई का समय आया, उन्होंने चुपचाप अपनी बेटी की हथेली में एक पुराना मंगलसूत्र रख दिया था।
“ये तुम्हारे नानी का था। जब भी तुम्हें लगे कि सब कुछ छूट रहा है, इसे पहन लेना। ये सब कुछ नहीं, पर कुछ थामे रखेगा।”
अवंतिका ने वह मंगलसूत्र कभी नहीं पहना — पर वह एक कपड़े के छोटे थैले में, उसकी डायरी के साथ रखा रहा।
राघव ने कभी ज्यादा नहीं बताया था अपने घर के बारे में।
बस इतना कि उनके पिता सिविल इंजीनियर थे — बहुत अनुशासित, कम बोलने वाले, लेकिन घर में सबसे ऊँची आवाज़ उन्हीं की होती थी।
कभी-कभी राघव कहता, “माँ अक्सर बिना वजह माफ कर देती थीं… शायद उन्होंने चुप रहना सीख लिया था।”
अवंतिका ने तब इसका अर्थ नहीं समझा था।
शादी के बाद वह समझने लगी — राघव भी वही चुप्पी ढोकर लाया था, जिसे वह भूल जाना चाहता था।
दिल्ली के पॉश इलाके वसंत कुंज में उनका 2 बी एच के फ्लैट एक सपना था।
एक कोना अवंतिका के किताबों का, एक कोना राघव के इनडोर प्लांट्स का।
सुबहें तुलसी की चाय से शुरू होतीं, रातें नेटफ्लिक्स और लाल मखमली कंबल में सिमटतीं।
मित्रों की नज़र में वे एक आदर्श युगल थे — जहाँ सम्मान था, मुस्कराहटों भरी चुहलबाज़ी थी और विचारों में मधुर असहमति भी।”
पर उस रिश्ते की इमारत में जो ईंटें थीं — वे बहुत नई थीं। और नई ईंटों पर अगर वक़्त की मोहर न हो, तो वे मौसम नहीं सह पातीं।
अवंतिका और राघव — दोनों ही मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करने वाले, एक ‘प्रोग्रेसिव’ युवा दंपति थे। शादी को तीन साल हुए थे — शुरू में सब कुछ नया, रोशन, रोमांचक। एक-दूसरे की आज़ादी को स्पेस देना, एक – दूसरे को सम्मान देना और काउंटर पर झगड़ते हुए चाय पीना — सब अच्छा लगता था।
फिर मार्च 2020 आया। पहले तो उन्हें लगा — ‘चलो, कुछ समय साथ बिताने को मिलेगा। ऑफिस की भाग-दौड़ नहीं, ट्रैफिक नहीं और हर दोपहर साथ में खाना।’ पर जो स्पेस कभी “प्यार का दायरा” था, अब “सीमितता की कैद” बन गया।
राघव सुबह 9 बजे लैपटॉप खोलता। उसके पास टेबल था। अवंतिका को बेड से काम करना पड़ता। कभी वह बोलती, “मेरे लिए भी एक कुर्सी मंगवा लेते,” तो राघव हँसकर टाल देता — “बेड से ही तो अच्छा काम होता है।”
रसोई, साफ-सफाई, वॉशिंग मशीन — धीरे-धीरे सब “काम की मदद” से “तुम्हारी जिम्मेदारी” में बदलता गया।
पहले जो ‘पार्टनरशिप’ थी, अब वह ‘एक्सपैक्टेक्शन’ हो गई। “कितनी बार बोलूं, ऑनलाइन मीटिंग के समय मुझे डिस्टर्ब मत किया करो।” — राघव का स्वर कुछ तेज़ हुआ।
“मैंने तो बस पूछा था कि सिकंजी में नमक डालूं या चीनी,” अवंतिका ने रुखाई से कहा।
बात वहीं रुकी नहीं — बल्कि दीवार में एक महीन सी दरार बन गई।
दिन भर साथ रहने के बावजूद बातचीत कम होने लगी। अवंतिका को राघव की स्क्रीन पर दिखती किसी महिला की हँसी खटकती। राघव को लगता कि अवंतिका बेवजह शक करती है। रात को अवंतिका गहरी चुप्पी में सो जाती और राघव मोबाइल में इंस्टाग्राम की रील्स देखते-देखते आंखें बंद कर लेता।
एक दिन उसने कहा, “तुम कुछ ज़्यादा ही चुप रहने लगी हो।” अवंतिका ने पलटकर जवाब दिया, “चुप रहने के अलावा क्या बचा है?”
उस रात खाने में नमक कम था। राघव ने प्लेट किनारे रख दी। 14 मई, अवंतिका की डायरी “आज उसने मेरी आँखों में नहीं देखा। लेकिन मेरा मन फिर भी उसकी नजरें ढूंढता रहा। एक चुप्पी उसके चेहरे पर थी — और मेरे भीतर भी। क्या हमने कुछ खो दिया है, जो हमें पता ही नहीं चला?” कमरे की दीवारें सफेद थीं, पर अवंतिका को उनमें धुंधली लकीरें दिखती थीं — जैसे किसी ने अनदेखे हाथों से दीवार पर अनकहे शब्द लिख दिए हों।
वह कई बार रसोई में खड़ी होकर बर्तन धोते हुए, किसी और ही दुनिया में चली जाती। उसने मन में माँ से बात शुरू की: “माँ, तुम्हें याद है तुमने कहा था कि सच्चा रिश्ता वो होता है जहाँ डर न हो?”
“हाँ बेटी, जहाँ अपने आप को समझाना न पड़े हर दिन — वही सच्चा रिश्ता होता है।” “माँ, क्या तुम भी कभी चुप रह गई थीं — किसी के गुस्से के बाद?” “बहुत बार। पर वो मेरी गलती थी। तुम मत दोहराना।”
उसने अपना हाथ धोते हुए गौर किया — उंगलियों की पोरें छिल गई थीं। ना जाने कब से वह दस्ताने पहने बिना ही बर्तन धो रही थी।
वह खुद से बुदबुदाई — “शायद मेरी भी गलती है। मुझे इतनी भावुक नहीं होना चाहिए।”
उस शाम वह बालकनी में बैठी थी, जब उसका ध्यान एक पुराने मैसेज पर गया — श्रुति, उसकी कॉलेज की दोस्त, जो साल भर अपमानजनक रिश्ते में रहने के बाद एक दिन अचानक सब छोड़कर चली गई थी।
श्रुति ने तब कहा था — “जब एक दिन खुद से डर लगने लगे, तो समझ लेना — कुछ बहुत ग़लत चल रहा है।”
अवंतिका ने उसके मैसेज को दोबारा पढ़ा। क्या मैं खुद से डरने लगी हूँ? फिर एक और सवाल भीतर से उभरा — “क्या मेरा दुख वाजिब है?” “या मैं इसे बस बढ़ा-चढ़ाकर देख रही हूँ?”
“क्या मैं ओवर्रियक्ट कर रही हूँ?” राघव ने पिछले हफ्ते उसकी वॉशिंग मशीन चलाने पर झल्लाकर कहा था — “तुम्हें क्या ज़रूरत है हर बात पर तर्क करने की? तुम्हें सुनना नहीं आता, बस बोलना आता है!”
उसी रात, अवंतिका ने खुद को दोहराते पाया — “शायद मैं ही ज्यादा प्रतिक्रिया दे रही हूँ। सब तो ऐसा ही करते हैं।”
“शायद मेरी उम्मीदें ही ज़्यादा हैं।” पर फिर एक दूसरी आवाज़ आई — “पर जब मैं रोती हूँ, तब वो कभी पास क्यों नहीं आता?”
“जब मैं चुप हो जाती हूँ, तो वह सहज क्यों हो जाता है?” “और ये जो गुठली-सी चीज़ गले में अटकी रहती है… ये कोई ख्वाहिश नहीं, ये शिकायत है।”
वह अक्सर दो चरम सीमाओं के बीच फंसी रहती — एक तरफ वह जो राघव को जस्टिफ़ाय करती — “वह भी थक गया है, उसका स्ट्रेस ज़्यादा है।”
दूसरी तरफ वह जो उससे सवाल करती — “पर थकान की आड़ में कोई कैसा भी बर्ताव कर सकता है?” कभी गिल्ट हावी हो जाता — “मैं ही सही से स्पोर्ट नहीं कर पाई शायद।”
कभी उसका सेल्फ- रेस्पेक्ट सवाल उठाता — “तो क्या स्पोर्ट का मतलब यह है कि मेरी आवाज़ ही गायब हो जाए?”
लॉकडाउन के दौरान एक दिन कई महीनों से बंद पड़ी बालकनी की खिड़की की ओर अवंतिका की नज़र जाती है। कभी वह और राघव वहां शाम की चाय पीते थे। अब वहां एक कुर्सी भी उलटी पड़ी है, और दरवाज़ा जाम-सा हो गया है।
एक दिन झगड़े के बाद, जब राघव सो रहा होता है, वह उठती है और बालकनी का दरवाज़ा खोलने की कोशिश करती है। जंग लगा हैंडल ज़रा विरोध करता है। लेकिन धीरे-धीरे खुलता है — एक किरकिराती, लगभग तकलीफ़देह आवाज़ के साथ।
जैसे ही दरवाज़ा खुलता है, बाहर की हवा भीतर आती है। धूप सीधी उसके चेहरे पर पड़ती है।
वह वहां बैठती है। आँखें बंद करती है और एक लंबी साँस लेती है।
3 जुलाई, अवंतिका की डायरी- रात को नींद नहीं आती। वो मेरे पास होता है, लेकिन जैसे दूर किसी अंधेरे में गुम। मैं उठकर बालकनी का दरवाज़ा खोल देती हूँ। ठंडी हवा में कुछ देर साँस लेना भी जैसे संघर्ष जैसा लगता है।
एक सुबह, नाश्ता बनाते हुए वह अचानक ठिठकी। अलमारी के शीशे में उसने खुद को देखा — आँखों के नीचे हल्के काले घेरे, बाल अस्त-व्यस्त, होंठों पर नमी नहीं।
और उसके भीतर एक आवाज़ फूटी — “ये मैं हूँ? वो लड़की जो कविता लिखती थी, जो बहस करती थी क्लासरूम में?”
“मैं तो जैसे गायब हो गई हूँ। अब मैं सिर्फ एक शरीर हूँ, जो सुबह उठता है, काम करता है, रसोई संभालता है और चुप रहता है।”
उसने उस शाम डायरी में लिखा: “जब प्यार में अपने होने का बोध मिटने लगे —
तो वो रिश्ता नहीं, एक भूमिका बन जाता है।
मैं अब अवंतिका नहीं, एक घरेलू अनुबंध की मूक हस्ताक्षर बन गई हूँ।” “माँ को आज फिर याद किया। सोचा, पूछूं — क्या तुम भी कभी पापा से डरती थीं?
क्या प्यार में डर होना ज़रूरी होता है? फिर सोचा, रह जाने दूँ — शायद कुछ सवाल बस मन के लिए होते हैं।”
लॉकडॉउन के तीसरे महीने में एक दिन अवंतिका ने बिना पूछे वॉशिंग मशीन चलाई, जबकि राघव की जूम कॉल थी। राघव चिल्लाया — “ये कौन करता है यार? कॉमन सेन्स नाम की चीज़ है भी या नहीं?” अवंतिका सन्न रह गई। उसकी आंखें भर आईं — “इतनी छोटी सी बात के लिए चिल्लाने की ज़रूरत थी?”
राघव चुप हो गया। पर उस चुप्पी में हिंसा थी। शब्दों से कही गई हर चोट का घाव शरीर पर नहीं, आत्मा पर होता है। और वह किसी मेडिकल रिपोर्ट में दर्ज नहीं होता।
एक शाम अवंतिका बालकनी में बैठी थी, कॉफी का प्याला हाथ में था — वही प्याला जो हल्के से चटक गया था कुछ दिन पहले, और जिसे वह अब भी रोज़ इस्तेमाल करती थी। तभी बगल वाले फ्लैट से कुछ आवाज़ें आने लगीं। दरवाज़े बंद थे, खिड़कियाँ भी शायद, फिर भी वो आवाज़ें… चीखने की, चिल्लाने की, कुछ गिरने की।
कुछ पल बाद सब शांत हो गया। लेकिन उस शांति में जो गूंज थी, वह अवंतिका के भीतर तक उतर गई।
वह उस क्षण कुछ नहीं बोली। बस बालकनी की रेलिंग थामे चुपचाप खड़ी रही, जैसे अगर वह कुछ बोलेगी तो खुद अपने भीतर कुछ बिखर जाएगा।
अगली सुबह कामवाली की कॉल आई — “दीदी, दो दिन से नहीं आ पा रही हूँ। आप लोगों के यहाँ सब ठीक है ना?” “हाँ, हम ठीक हैं,” अवंतिका ने जवाब दिया। कामवाली कुछ देर चुप रही, फिर धीरे से पूछा — “आपके यहाँ भी कभी लड़ाई होती है क्या, दीदी?” अवंतिका को कुछ जवाब नहीं सूझा। उसने सिर्फ कहा, “तुम अपना ख्याल रखो।”
कुछ दिन बाद एक एन जी ओ से कॉल आया। “नमस्कार, हम लॉकडाउन के दौरान मानसिक स्वास्थ्य पर एक सर्वे कर रहे हैं। क्या आप कुछ सवालों का जवाब देंगी?” अवंतिका ने पहले टालना चाहा, फिर अचानक हाँ कह दिया। सवाल सभी लगभग साधारण ही थे —
“क्या आप अकेलापन महसूस करती हैं?” “क्या पिछले दिनों आपके मूड में कोई बदलाव आया है?”
“क्या आपने किसी से मदद माँगने की सोची है?”
पर हर सवाल उसके भीतर एक दरार से टकरा रहा था। फोन रखने के बाद वह आईने के सामने गई — अपने चेहरे को देखा, जैसे पहली बार देख रही हो। वहाँ कोई स्पष्ट निशान नहीं थे, पर कोई छुपी थकान ज़रूर थी।
तभी खिड़की के उस पार फिर वही महिला की धीमी चीख सुनाई दी। इस बार अवंतिका ने खिड़की के पास जाकर पर्दा हटाया नहीं, बस वहीं खड़ी रही — और उस आवाज़ को अपने भीतर समेट लिया। जैसे कोई अदृश्य गठजोड़ बन रहा हो इन दीवारों के बीच — एक दुख की लड़ी, जो कई घरों को जोड़ती थी, बिना किसी आवाज़ के।
एक दिन किराने का सामान लेकर लौटते वक़्त, अवंतिका को पौधों की दुकान पर एक छोटा इनडोर प्लांट दिखता है — मनी प्लांट।
बचपन में माँ कहती थीं — “घर में हरियाली रहे तो मन भी हरा रहता है।” अवंतिका उसे ले आती है। घर के कोने में रखती है। एक टूटी हुई काँच की बोतल में पानी भरकर उसमें लगाती है। हर दिन उसे थोड़ा पानी देती है, धूप की ओर मोड़ती है।
धीरे-धीरे वह बेल बढ़ने लगती है — बहुत धीमे, पर निरंतर। कभी कोई पत्ता पीला भी पड़ता है, लेकिन बाकी हरे रहते हैं। जैसे अवंतिका का अपना मन। जैसे वह खुद।
जिन्हें सालों से पालन – पोषण नहीं मिला, लेकिन अब वे खुद को पालने लगी हैं।
अवंतिका ने एक ऑनलाइन वर्कशॉप में जाना शुरू किया — “इमोशनल हेल्थ फॉर वुमेन इन आईसोलेशन.”
वह धीरे-धीरे समझने लगी कि जो घट रहा है, वह सामान्य नहीं है। हर छोटी बात पर एकाउंटबिलिटी, गिल्ट, और ब्लैम — ये प्यार नहीं, कंट्रोल है।
उसने थेरापिस्ट से बात की। “क्या आप डोमेस्टिक वॉयलेंस फेस कर रही हैं?”
“नहीं, उन्होंने मुझे कभी मारा नहीं।” “मौन भी हिंसा होती है, इमोशनल नेगलेक्ट भी।” उस रात उसने डायरी में लिखा: 22 जून “मैं बहुत दिन से सिर्फ सरवाईव कर रही हूँ, जी नहीं रही।”
मैंने आज पहली बार थेरापिस्ट से खुलकर बात की। जैसे कोई अंदर का बोझ उतर गया हो।
मैं डरी थी कि मेरी बातें किसी को बचकानी न लगें — लेकिन उसने ध्यान से सुना, जैसे मेरी चुप्पियों को भी शब्द मिल गए हों।
एक दिन, राघव ने गुस्से में आकर उसका फोन छीन लिया। “तुम किससे बात कर रही थी इतनी देर? इतने पासवर्ड्स क्यों हैं तुम्हारे फोन में?”
अवंतिका का चेहरा सख्त हो गया। “तुम्हें क्या हक है मेरा फोन छीनने का?” “तुम्हारे बदलने का तरीका बता रहा है कि कुछ चल रहा है।”
उसने कहा — “हाँ, चल रहा है। मेरी समझ चल रही है कि ये शादी एक पिंजरा बन चुकी है।” वो उठी और कमरे से बाहर चली गई।
रात के दो बज रहे थे। अवंतिका ड्रॉइंग रूम में बैठी थी — चुप, स्थिर। और राघव बालकनी में — सिगरेट का धुआँ ठंडी हवा में खोता जा रहा था।
फोन पर धीरे से एक आवाज़ आई — “हाँ पापा, सब ठीक है।” दूसरी तरफ से एक भारी, आदतन सख्त स्वर — “बहू ज़्यादा सवाल करती है?” “नहीं… बस कभी-कभी बहस हो जाती है।”
“बहस करने दो। पर ध्यान रहे — काबू में रहे। रिश्ते में हद जरूरी है। तुम मर्द हो।” राघव कुछ नहीं बोला। फोन काट दिया।
वह देर तक बालकनी की रेलिंग को पकड़े खड़ा रहा। माँ की एक तस्वीर उसे याद आई — एक कोने में बैठी, चुपचाप सलाद काटती माँ, जिसके चेहरे पर हमेशा “कुछ कहने की इजाज़त नहीं” जैसी मुद्रा रहती थी।
उसने खुद से पूछा — “क्या मैं वही बन रहा हूँ जिससे मैं बचना चाहता था?”
जब वह ऑफिस जाता था, तो दिन की थकान के बाद भी वह अपने में संतुलन पा लेता था।
पर अब, चार दीवारों के बीच जूम कॉल्स, अन्मेट टार्गेट्स और न खत्म होती ईमेल्स ने उसे ऐसा महसूस कराया— जैसे उसकी आईडेंटिटी अब बस एक वर्कर बनकर रह गई है।
कभी-कभी वह देर रात तक रील्स देखता था, सिर्फ यह सोचकर कि हँसी की ये आवाज़ें उस भारीपन को कम कर देंगी — जो हर शाम घर लौटते समय माँ के चेहरे पर होता था।
एक रात, राघव उसके सामने बैठा। उसने कहा — “मैंने तुम्हें खो दिया है क्या?”
“तुमने कभी पाया ही कहाँ था,” अवंतिका बोली। “तो अब क्या कर सकते हैं?” “तुम्हें समझना होगा — गुस्सा, शक, तंज — ये सब चोट करते हैं।” “तुम्हें भी कहना होगा जब कुछ अच्छा नहीं लगे — चुप रहकर नहीं।”
धीरे-धीरे कुछ बदला। किसी एक दिन नहीं। किसी नाटकीय शाम को नहीं। बस, जैसे कोई धागा थोड़ा-थोड़ा खुलता है, गांठ खुद-ब-खुद ढीली होने लगती है।
“क्या हम कोशिश कर सकते हैं?” राघव की आवाज़ बहुत धीमी थी — जैसे स्वीकार कर रहा हो कि वह कुछ हार गया है। अवंतिका ने सीधे नहीं देखा, पर सुना। वह कुछ नहीं बोली, मगर अगले दिन थेरापिस्ट का नंबर उसने फिर से डायल किया — इस बार दो अपॉइंटमेंट बुक हुए।
थैरेपी की शुरुआत आसान नहीं थी। पहले सत्र में सिर्फ चुप्पियाँ थीं — जैसे दोनों लोग शब्दों से ज़्यादा अपनी थकान को लेकर आए थे।
“आप दोनों को खुद से पहले एक-दूसरे की थकान को समझना होगा,” काऊंसलर ने कहा।
“संघर्ष सिर्फ आपके बीच नहीं है — आपके भीतर भी है।”
धीरे-धीरे साप्ताहिक सत्रों में कुछ खुलने लगा। राघव ने अपने पिता के गुस्से की कहानियाँ साझा कीं — कैसे घर में कंट्रोल और साईलेन्स ही एफेक्शन का पैमाना था। अवंतिका ने बताया कि उसने कितनी बार खुद से कहा था — “शायद मैं ही ज़्यादा सोच रही हूँ…”
एक दिन, राघव ने खुद से पूछा — “मैं क्या वाकई वैसा ही बन रहा हूँ, जैसा मैं बचपन में डरता था?” और उस दिन पहली बार उसने खुद को देखा — सिर्फ एक पति नहीं, एक अनजाने डर से जूझता हुआ बेटा, जो प्यार माँगता था पर देना नहीं जानता था।
थैरेपी के तीन महीने बाद, घर में बदलाव दिखने लगा। एक शाम अवंतिका बालकनी का जंग लगा दरवाज़ा खोलती है — वही, जो लॉकडॉउन के बाद से बंद था। हवा का एक झोंका आता है और छोटा-सा इनडोर प्लांट जो उसने लगाया था, उसकी पत्तियाँ हिलती हैं।
राघव चुपचाप उसके पास आकर बैठ जाता है। “कल वाली मीटिंग में मैंने इरीटेट होकर भी तुमसे बहस नहीं की,” वह कहता है, हँसते हुए। अवंतिका मुस्कुरा देती है — जैसे कोई बहुत पुरानी आदत फिर से पनप रही हो।
अवंतिका की डायरी — 4 अगस्त : “हमारे बीच जो है — न पूरी दूरी, न पूरा नज़दीक — वही तो दरमियान है। कभी एक लंबा सन्नाटा, कभी एक अधूरा वाक्य। कभी उसकी बाँह में रुककर रह गई मेरी ऊँगली, कभी उसके होंठों तक आते-आते ठिठकी मेरी बात।
शायद यहीं से हीलिंग शुरू होती है — न पूरे साथ से, न पूरी जुदाई से — बल्कि दरमियान से।” एक दिन कप्लस थेरेपी के दौरान, थेरापिस्ट ने पूछा —
“राघव, आप किससे डरते हैं?” राघव चुप रहा। फिर बोला — “मैं एक बार भी नहीं चाहता था कि मेरा रिश्ता ऐसा बने। लेकिन लॉकडॉउन ने मुझे ऐसा आईसोलेट कर दिया कि… जैसे कोई अंदर ही अंदर घुट रहा हो। मैं खुद को सिर्फ गुस्से में महसूस कर पाता हूँ।”
“आपने कभी किसी को खोने का डर महसूस किया है?” “हाँ, खुद को।” उसकी आँखें कुछ देर के लिए झुक गईं।
उसी रात, राघव ने फोन उठाकर माँ का नंबर डायल किया। “माँ, तुम्हें याद है, तुम हमेशा चुप क्यों रहती थीं?” माँ थोड़ी चौंकी — “अचानक ये सवाल क्यों?” “क्योंकि अब वो चुप्पी मेरे अंदर भी पलने लगी है।”
अवंतिका सुबह की चाय बनाकर मेज़ पर रखने जाती है, तो राघव का फ़ोन बज रहा होता है। वह जल्दबाज़ी में उठने की कोशिश करती है और मेज़ पर रखा कप गिरकर टूट जाता है। राघव बिना कुछ कहे चला जाता है। अवंतिका थोड़ी देर बिखरी चाय की छींटों को देखती है — जैसे कोई गर्म, गाढ़ी चीज़ धीरे-धीरे बह रही हो। फिर वह झुककर कप के टुकड़े समेटती है। कुछ टुकड़े बहुत छोटे हैं, चुभ सकते हैं — लेकिन वह चुपचाप उन्हें भी चुन लेती है।
वह टूटी चीज़ों को जोड़ना जानती है। लेकिन क्या हर चीज़ जुड़ सकती है? वह कप के दो बड़े टुकड़े सटीक रखकर जोड़ने की कोशिश करती है। पर एक दरार हमेशा बच जाती है — एक रेखा, जो अब कभी मिट नहीं सकती। 19 सितंबर, अवंतिका की डायरी: आज मैं टूटा कप जोड़ती रही — फिर भी दरारें दिखती हैं। शायद यही रिश्ते होते हैं। जोड़ते जाओ, और वो चुपचाप रिसते रहें।
मैंने आज मनीप्लांट की नई डाली देखी। कितना कुछ सिखा देती है ये हरियाली, बिना बोले।
हर हफ्ते, थेरापिस्ट दोनों को नए अभ्यास देती — एक-दूसरे के दिन के बारे में पूछना
पुराने किसी अच्छे पल को याद करना काम बाँटना, भूमिकाएं बदलना।
एक दिन राघव ने कहा — “आज मैं रोटी बनाऊंगा, तुम कॉल पर आराम से बैठो।” अवंतिका मुस्कराई — जैसे बहुत समय बाद कोई भूली भाषा फिर से सुनाई दी हो। कहानी कोई परीकथा नहीं बनती। हर दिन एक प्रयास है, एक पुनर्निर्माण।
पर अब वे दोनों जानते हैं — प्रेम में बराबरी जरूरी है और संवाद सबसे बड़ा औज़ार। कोविड ने कई रिश्तों की परतें खोल दीं — कुछ बिखर गए, कुछ समझदारी से निखर गए।
अवंतिका अपनी डायरी में लिखती है: “हम दोनों अब भी उसी घर में हैं। फर्क बस इतना है — अब घर की दीवारों में दरारें नहीं, खिड़कियाँ हैं।”
संपर्क : मो. 9351159540 ; gcbagri@gmail.com
