पल्लवी हिन्दी की रचनात्मक दुनिया में कुछ अरसा पहले ही दाखिल हुई हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य में एम. ए. और पीएच.डी की उपाधि हासिल की है। वे दोहरीघाट, जिला-मऊ, उत्तर प्रदेश से संबंध रखती हैं। ‘नया पथ’, ‘समकालीन जनमत’ और ‘पहली बार’ जैसे वेब पोर्टल्स पर उनकी कविताओं का प्रकाशन हो चुका है। उनकी कविताओं में स्त्री-दृष्टि एक नए तेवर और नितांत अनुपम भंगिमा के साथ उपस्थित है। ‘युवा’ प्रस्तुति के तहत उनकी कविताओं का प्रकाशन ‘सबद’ पर पहली बार हो रहा है।
दूसरे के भरोसे
मैं चली जाऊंगी, दूर देस
बेची हुई बकरी के साथ
पाले हुए मेमने की तरह
तुम मुझे आंसुओं से लिखा
पत्र समझो
जो यथार्थ पहुंचाता है
पढ़ने वाले की अश्रु-मिश्रित आंखों
भाव-कंपित कपोलों से
लार भरे गले तक
लेकिन याद रखना
मैं अकेली नहीं जाऊंगी
जाने से पहले लगाऊंगी सेंध
फिर तुम्हारी
आवाज़ से तराशे शब्द
तुम्हारी मौलिक जीवन-दृष्टि
स्मृति में सहेजे,
इसी जीवन में जीती
तुमसे तुमको चुराती जाऊंगी
जैसे दूसरे के भरोसे
विदा की जाती है, बेटियां
वैसे ही तुमको भी
मुझे विदा करना पड़ेगा
असत्य जीवन
स्त्रियां नहीं कह सकीं
अपने जीवन का सत्य
वो करती रहीं प्रेम
और छिपाती रहीं
अपने अंदर की अनंत गहराइयों को,
अपने जीवन को
यथार्थ को
अपने बीते हुए कल को
उन कलों को
जिनका निर्माण
पुरुषों ने ही किया था
उनको पता था कि
वो जिनसे कर रही हैं प्रेम
या पा रही हैं
उनसे कहा गया सत्य
केवल वंचना लायेगा
आखिर,
किस प्रेम की तलाश में रहीं वे?
उन्होंने अपने आस-पास
निर्मित कर लिए
असत्य के आवरण
वे असत्य ठीक वैसे ही थे
जिनसे पुष्ट हो रहा था
पुरुषों का अहंकार
स्त्री को गहन प्रेम में भी
ध्यान रखना पड़ा
कहीं पुरुष अहंकार खंडित न हो जाए
और पुरुष खुश रहा ये सोचकर
मेरे पास है जो स्त्री
वो,
ठीक मेरे मानदंडों की है
इस तरह
घुटती रही आत्मा,
तड़पती रही चेतना,
व्याकुल रहा मन,
और परेशान हृदय
बीमार समाज की फिटनेस
रखे ध्यान
बनाते आदर्श-दाम्पत्य
अंततः विदा हुआ
जर्जर जीवन
त्यागता हुआ, स्त्री होने के अभिशाप को
जलती रही लौ
गिरती रही राख
चटकती हड्डियां
जिनमें लिखा था –
मैंने असत्य को जिया है
सत्य नहीं कह पायी
तुम्हारी दुनिया में
सत्य को स्पेस नहीं
तुम दयनीय और निरीह हो
क्योंकि तुममें नहीं है, आत्मबल
कि अपना असली चेहरा भी देख सको
भिंचा हुआ जबड़ा
तुम हो सके तो समझना
सबसे पहले उसका पक्ष
जिस पर, नैतिकता ने हमला करके
उसके अधिकार का हरण कर लिया हो
तुम्हें खून चूसने वालों के
दांतों से अधिक चुभना चाहिए
उनका भिंचा हुआ जबड़ा,
जो छटपटा रहे असहाय पर
अधिक पकड़ बनाना चाहता है
तुम जब स्त्रियोचित जीवन बताने वाले
उपदेशकों को सुन रहे हो
तब नहीं भूलना
बलात्कारियों के विचार
जो एक तरह से मॉरल -पुलिस होने का
दावा कर रहे थे
तुम गौर करने पर
सुधारकों और आतातायियों
में बहुत अंतर नहीं पाओगे
क्योंकि दोनों के पास है;
सत्य
सत्य जिनके पास होता है
वो धर्म से अधिक
हिंसा की औलादें हैं
यदि तुम सच में निकले हो
जानने को कुछ ऐसा
जो तुममें थोड़ी और समझ ला दे
तो त्याग देना तुम्हारी
सड़ी हुई अंतरात्मा
क्योंकि यह भी
परम्परा से उपजी बुद्धि है
इसीलिए तुम्हारी अंतरात्मा से
ज्यादा घातक कुछ नहीं
मोबाइल-टॉवर
मेरे छत से दूर
आसमान का कोना बनाने को आतुर
दूर खड़ा मोबाइल-टॉवर
पल भर को सही
लेकिन गिरफ्त में ले लेता है
चमकते चांद को
उस पल चांद सीधा,
गोल या आधा नहीं होता
सच कहूं तो उसका मुंह ही नहीं होता
फिर कैसे टेढ़ा कहा जा सकता है
मेरे चांद का मुंह बेबस है,
लाचार है
लगता है, उसकी छाती में खड़ा है
मोबाइल – टॉवर …
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