अनुवादकविता

अरुण कोलाटकर की कविताएँ

टिप्पणी एवं अनुवाद : उपमा ऋचा

भारतीय अंग्रेजी लेखक अरुण कोलाटकर (1 नवंबर 1932-25 सितंबर 2004) आधुनिक भारतीय साहित्य का महत्वपूर्ण नाम हैं। वे अपनी मातृभाषा (मराठी) और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में समान अधिकार से लिखते थे, जिसका उदाहरण हैं जेजुरी सीरीज के अंतर्गत लिखी उनकी कविताएं। इस संग्रह में कुल 31 कविताएं संकलित हैं, जो उन्होंने 1964 की अपनी जेजुरी यात्रा के पश्चात लिखी थीं। 1974 में लिट्रेरी क्वाटर्ली में प्रथम प्रकाशन के बाद में यह कविताएं 1976 में पुस्तक रूप में प्रकाशित हुईं और अगले वर्ष कॉमनवेल्थ पोइट्री प्राइज़ से सम्मानित हुई। इस सीरीज में कोलाटकर ने एक ऐसे पात्र के माध्यम से गहन दार्शनिक भाव और दृष्टि को शब्द देने का प्रयास किया गया है, जो जीवन को अपने इतर भी देखना-समझना चाहता है। जो अपने आसपास ठहरी अनसुनी पुकार को सुनना चाहता है। जो संसार को केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं बूझना चाहता है। जो विश्वास और अंधविश्वास के बीच खिंची अन्तर की बारीक लकीर और उसके आसपास बिखरे अंधकार को तर्क की माचिस से प्रकाशित करना चाहता है।
इसी चाहत के वशीभूत एक रोज़ वह खुद को महाराष्ट्र के छोटे से क़स्बे जेजुरी में खड़ा पाता है, खंडोबा की धरती पर… वहां पहुंचने, वहां होने और वहां से लौटने की जो संपूर्ण अनुभव यात्रा है, दरअसल वही जेजुरी सीरीज की कविताओं में दर्ज़ है। जिन्हें कवि ने आस्था की जमीन पर खड़े होकर तर्क के सहारे लिखा है। शायद इसीलिए पाठक इन कविताओं में दाखिल होते ही ख़ुद को विश्वास और संदेह के दो विपरीत छोरों से एक साथ खेलता, एक साथ संवाद करता, एक साथ उलझता-सुलझता पाता है। जहां कविता की भाषा-शैली बड़े सायास ढंग से पाठकों के भीतर एक अतिरिक्त प्रभाव रचती है।
यह सही है कि इन कविताओं में कुछ अविश्वास, कुछ प्रश्न, कुछ चुनौतियां है, किंतु इस आधार पर इन्हें किसी नास्तिक का बयान मान लेना उचित नहीं। अलबत्ता इन्हें ‘तर्क को बचाने की कोशिश; के तौर पर ज़रूर देखा जा सकता है। एक प्रकट और स्पष्ट कोशिश के तौर पर… भले कोलाटकर की इस कोशिश पर समकालीनों ने बहुत ध्यान नहीं दिया, लेकिन इसने कोलाटकर को उन मसिजीवियों की जमात में ले जाकर खड़ा कर दिया, जो धारा के विरुद्ध जाए बगैर उसे नई दिशा में मोडने की सलाहियत रखते हैं। यही वजह है कि कुछ आलोचक इन कविताओं को मैटर ऑफ स्ट्रेंजनेस इन आर्टके बेहतरीन उदाहरण के रूप में देखते हैं, जिसे लगभग एक सदी पहले विक्टर श्क्लोव्स्की ने Defamiliarisation के रूप में व्याख्यायित करने की कोशिश की थी। और कुछ इनकी समतुल्यता फिलिप लर्किन की चर्च गोइंग से करते हैं। आइए पढ़ते हैं इसी सीरीज की तीन कविताओं का अनुवाद…

खरोंच  

यह कविता उस बारीक रेखा की पड़ताल करती है, जिस पर चलकर पत्थर से देव होने की यात्रा पूरी होती है। कविता के केंद्र में पत्थर है। पत्थर-पत्थर का अंतर है। माने एक वह पत्थर, जो जड़ है। साधारण है। दूसरा वह पत्थर, जो पवित्र है, पूज्य है, चैतन्य है, असाधारण है। छोटी, घोषणात्मक पंक्तियों से युक्त इस कविता की संरचना सरल है, जो प्रत्यक्ष अनुभव जैसा भाव पैदा करती हैं। इस कविता में उस सत्य अथवा तथ्य को दर्ज करने की जद्दोजहद है, जो तर्क की नोंक से आस्था के पत्थर को खरोंचने पर प्रकट होगा। किंतु ‘खंडोबा की पत्थर हो गई पत्नी...’ पंक्ति अपने अर्थ के आगे जाकर सहज ही एक बड़ा रूपक रचती है, जो विमर्श को आस्था और तर्क की गलियों से निकालकर उस चौराहे तक ले जाते हैं जहां नारीवाद के झंडे फड़फड़ा रहे हैं। जहां गूंज रहा है सिमोन का सुप्रसिद्ध कथन ‘स्त्री पैदा नहीं होती, बना दी जाती है...‘ और जहां जुड़ जाती हैं कड़ियां कि ‘स्त्री पत्थर होती नहीं, बना दी जाती है!'

कौन ईश्वर है

और कौन है पत्थर

इस विभाजक रेखा का अगर कहीं अस्तित्व है,

तो जेजुरी में वह रेखा बहुत पतली है

बहुत बारीक…

क्योंकि यहां हर दूसरा पत्थर

या तो ईश्वर है या उसका चचेरा-ममेरा भाई 

 

यहां

और कोई पैदावार नहीं होती

ईश्वर के अलावा

उसकी ही फसल बोई और काटी जाती है

यहां  

साल भर

चौबीसों घंटे

बेकार मिट्टी से

कठोर पत्थरों से

 

(देखो) शयनकक्ष के आकार का

पत्थर का वह विशाल टुकड़ा

वह खंडोबा की पत्थर हो गई पत्नी है

और देखो

जो दरार झांकती है न उसके सामने वाले हिस्से में

वह दरअसल उसके पति की तलवार का निशान है

जो शायद उस रोज़ इसे मिला

जब गुस्से में उसने मारा था इसे 


ऐसे ही

जिस भी पत्थर को खरोंचो,  

एक किंवदंती उभरती है

यहां…

यशवंत राव  

यह कविता एक विनम्र, स्थानीय देवता यशवन्त राव का परिचय देकर पारंपरिक देवताओं की एक अपरंपरागत आलोचना प्रस्तुत करती है। स्थानीय किंवदंती के अनुसार, जेजुरी में किले के निर्माण के दौरान 'अछूत' यशवंत राव ने उसकी रक्षा करते हुए अपने प्राणों की बलि दे दी थी। पुरस्कार के रूप में, उसे खांडोबा के मंदिर का द्वारपाल के रूप में स्थापित कर दिया गया। आज भी जेजुरी में यशवंत राव का मंदिर है, जिसमें उनकी आकारहीन (ब्रेसाल्ट से बनी) लाल रंग की छवि स्थापित है। ग्लैमरस या मांग करने वाले देवताओं के विपरीत, यशवंतराव की मान्यता एक ऐसे ईश्वर के रूप में है, जो व्यावहारिक है॥ जिसमें हीलिंग पॉवर है। जो शारीरिक बीमारियां दूर करता है। जो अधिक मानवतावादी, अधिक यथार्थवादी और अधिक भरोसेमंद है। कोलटकर की अन्य कविताओं की तुलना में, यह कविता सामाजिक मानदंडों और मानव अस्तित्व की जटिलताओं पर अधिक मुखर है। निश्चय ही इस कविता में धर्म और धर्म सत्ता पर सवाल उठाए गए हैं, लेकिन उसके साथ ही साथ यह एक रास्ता भी खोलती है ‘आध्यात्मिकता’ के लिए जो अधिक व्यावहारिक और भरोसेमंद सिद्ध हो सकता है।

क्या तुम ईश्वर को तलाश रहे हो?

अगर हां

तो मैं एक ईश्वर को जानता हूं

उसका नाम यशवंत राव है

और वह सबसे अच्छा ईश्वर है।

 

अगली बार जब तुम जेजुरी जाओ

तो उसे ज़रूर देखना।

निस्संदेह वह दोयम दर्जे का ईश्वर है

और उसकी जगह मुख्य मंदिर के ठीक बाहर है

बाहरी दीवार के भी बाहर

कोढ़ियों और फेरीवालों के बीच

मानो वह इनकी ही मल्कियत हो

 

मैं ईश्वरों को जानता हूं

सुंदर चेहरे वाले ईश्वर

या लाक्षा वाले ईश्वर

ईश्वर, जो तुम्हारे सोने-चाँदी के लिए तुम्हें चूसते हैं। 

ईश्वर, जो तुम्हारी आत्मा के लिए तुम्हें सोख लेते हैं।

ईश्वर, जो तुम्हें जलते कोयलों पर चलने को मजबूर करते हैं

ईश्वर, जो तुम्हारी पत्नी के भीतर एक शिशु रख देते हैं

और तुम्हारे शत्रु के भीतर खंजर

ईश्वर, जो तुम्हें बताते हैं

कि कैसे अपना जीवन जिओ

कैसे अपना पैसा दोगुना करो

या कैसे अपनी जमीन की जोत को तिगुना करो।

ईश्वर, जो बड़ी मुश्किल से अपनी मुस्कान दबाते हैं

जब तुम मीलों रेंगते जाते हो उनके लिए

ईश्वर, जो तुम्हें डूबता देखते रहेंगे

अगर तुम उनके लिए नया मुकट नहीं खरीदोगे।

 

हालांकि वे सभी प्रशंसनीय हैं

होने भी चाहिए

(लेकिन) मेरे हिसाब से

वे सब एक जैसे हैं

और बहुत नाटकीय…  

 

यशवंत राव;

बेसाल्ट (चट्टान का एक प्रकार) के एक ढ़ेर जैसा यशवंत राव  

पोस्ट-बॉक्स जैसा चमकीला यशवंत राव

कुछ-कुछ प्रोटो-प्लाज्म जैसा

या किंग-साइज़ लावा-पाई जैसा यशवंत राव

(जिसे) फेंक दिया गया है दीवार के इस पार

हाथ, पैर और यहां तक कि एक अदद सिर के भी बगैर…

 

यशवंत राव

वो ईश्वर है,

जिससे तुम मिल सकते हो

जिससे तुमको मिलना ही चाहिए

अगर तुम्हारे कोई अंग नहीं है,

यशवंत राव तुम्हारी ओर अपना हाथ बढ़ाएगा

और तुम्हें वापस अपने पैरों पार खड़ा कर देगा।

यशवंत राव

कोई भी चमत्कार नहीं करता

वह तुम्हें धरती देने का वादा नहीं करता

न ही वह तुम्हारे स्वर्ग जाने के लिए अगले रॉकेट में सीट बुक करवा सकता है

लेकिन अगर तुम्हारी हड्डी टूट गई है,

तो वह उसे ठीक कर देगा।

वह तुम्हें तुम्हारी देह से जोड़ देगा

एकाकार कर देगा

और उम्मीद करेगा कि

तुम्हारी आत्मा तुम्हारी देह को संभाल लेगी

 

वह केवल एक हड्डी-जोड़ने वाला भर ही है

लेकिन फर्क बस इतना है

कि उसके ख़ुद के न हाथ है, न सिर और न पैर…

और शायद इसीलिए

वह तुमको थोड़ा ज़्यादा बेहतर समझ सकता है।

एक छोटा मंदिर  

यह कविता कहन और बुनावट में ज़्यादा रहस्यात्मक है और अर्थ में ज़्यादा गहरी और मारक...  इस कविता में एक मंदिर है, मंदिर में मूर्तियां और मूर्तियों में ईश्वर! लेकिन कवि जब भीतर जाता है, तो उसे न मूर्ति दिखाई देती हैं और न ईश्वर। उसे दिखाई देता है अंधेरा इस कदर अंधेरा कि उससे मूर्तियों को, ईश्वर को प्रकट करने के लिए उसे माचिस जलाने की ज़रूरत महसूस होती है। कैसी बिडम्बना है न! यह बिडम्बना तब और थोड़ी गहरी हो जाती है जब माचिस के प्रकाश में यह अंतर प्रकट हो जाता है कि देवी मूर्ति की दरअसल अट्ठारह भुजाएं हैं, लेकिन पुजारी उन्हें अष्टभुजा कह रहा है। तब नास्तिक माचिस ख़ख़ारती है।यहां माचिस नास्तिक इसलिए नहीं क्योंकि वह नास्तिक के हाथ में है। यहां माचिस नास्तिक इसलिए है, क्योंकि उसकी दृष्टि पर आस्था का पर्दा नहीं है। विश्वासों का पहरा नहीं है। बजाय इसके उसके तर्क का प्रकाश है, जो संदेह से सत्य तक की का अनिवार्य पाथेय है। इसीलिए वह इस असंगति-बिसंगति को देख-सुनकर चुप नहीं रहती। अपनी असहमति दर्ज कराती है।  भले शब्द होकर न सही, ध्वनि (खंखार) होकर ही सही... वस्तुतः यही वह माचिस है जिसे कवि अपने पाठक को देना चाहता है ताकि सबकुछ अंधेरे में डूबने से पहले, थोड़ा प्रकाश बचाया जा सके कल के लिए...

छोटा मंदिर अपने देवताओं को अंधेरे में रखता है

तुम पुजारी को माचिस देते हो

और एक-एक करके प्रकाशित होते जाते हैं देव

मुदित कांस्य,

मुस्कुराते पत्थर,

विस्मयहीन!

आश्चर्यरहित!

 

माचिस की तीली इशारे से

क्षण भर के लिए जलती है और बुझ जाती है

खोई हुई भंगिमा से कोई भंगिमा मिलती है

और फिर खो जाती है।

 

यदि पूछो, ‘वह कौन है?’

तो पुजारी का उत्तर होता है, ‘अष्टभुजा देवी।’ 

नास्तिक माचिस खखारती है

तुम गिनते हो

तुम विरोध करते हो, ‘लेकिन भुजा तो अट्ठारह हैं।’

 

हुंह आठ या अट्ठारह… सब बराबर हैं।

पुजारी कहता है

उसके लिए वो अभी भी अष्टभुजा देवी ही है।

उपमा ऋचा युवा लेखिका और अनुवादक हैं। सात महत्वपूर्ण साहित्यिक एवं ऐतिहासिक कृतियों के हिंदी अनुवाद के अतिरिक्त एक साझा कविता संग्रह और इंदिरा गांधी की जीवनी ‘एक थी इंदिरा’ प्रकाशित है। हिंदी की पहली ऑडियो-विजुअल मैगजीन ‘अबेकलजुग’ का संचालन करती हैं। वे संप्रति ‘वागर्थ’ पत्रिका में मल्टीमीडिया एडीटर के पद पर कार्यरत हैं। उनसे  upma.vagarth@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। 

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