कविता

दीप्ति कुशवाह की कविताएँ

दीप्ति कुशवाह : काव्य संकलन ‘आशाएँ हैं आयुध’ को महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी का ‘संत नामदेव पुरस्कार’, निबंध संग्रह ‘गही समय की बाँह’ को महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी का ‘आचार्य रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार’, बाल कविता संग्रह – ‘दक्ष की फुलवारी’, प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविता, गद्य, विज्ञान लेख, लोक विषयक लेखन के साथ उपस्थिति. लोक चित्रकला पर पुस्तक – ‘मोतियन चौक पुराओ’, भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय की ओर से लोककला में सीनियर फेलोशिप, कई एकल कला प्रदर्शनियां. राष्ट्रीय पत्रकारिता दिवस पर आधारित कोलाज प्रदर्शनी ‘तस्वीरें बोलती हैं’ इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नयी दिल्ली में. दैनिक भास्कर, नागपुर अंतर्गत कुछ वर्ष संपादन. वर्तमान निवास : पुणे 

दीप्ति कुशवाह की ये प्रेम कविताएं न केवल अत्यंत सांद्र और एक सीमा तक रहस्यवादी अनुभव का निर्वचन हैं अपितु उनमें एक अनूठी कलात्मक शास्त्रीयता भी अंतर्निहित है। देह के नितांत वैयक्तिक अनुभव मिथकीय संदर्भों के साथ मिलकर यहाँ एक अलभ्य प्रणय-संसार सर्जित करते हैं। समकालीन कविता में आज प्रायः प्रेम की अभिव्यक्ति के स्वातंत्र्य के नाम पर भाषा की मांसल अभिव्यक्ति यत्र-तत्र दिखती है, उनके बीच सुंदर भाषा और गहरी अभिव्यक्ति से बुनी इन कविताओं को पढ़ना एक विरल अनुभव प्रतीत होता है। ये काव्यात्मक आस्वाद को नए सिरे से अनुकूलित करने वाली कविताएं हैं। 

विषमेखला की अनुगूँज     

तुम्हारे प्रस्थान के क्षण से
शुरू हुआ है यह असमाप्त कम्पन
न शब्दों में, न त्वचा पर
बस किसी दुर्ग्राह्य तंतु में
जहाँ स्मृति
फुफकार बन जाती है

मेरे भीतर
एक परित्यक्त सुरंग है
जहाँ कोई पदचाप नहीं
फिर भी हर रात
तुम्हारे नखों की छाया
मृदु-मृदु पीठ पर उतरती है
जैसे किसी नागयज्ञ की
गोपनीय क्रीड़ा
मौन के नक्षत्र अब

तुम्हारे नक़्शे में नहीं जलते
पर वे मेरे जठर में अर्धविराम की भाँति
हर दिन पुनः दहकते हैं

तुम्हारे द्वारा छोड़ी गई आकृति
अब सुवास नहीं
एक कुण्डलीबद्ध चिन्ह है
जो किसी पूर्वजन्म की
ज्वरग्रस्त तिथि को सँजोये हुए है
मैंने चाहा था
कि विस्मरण
किसी निर्वात की तरह उतर आए
पर तुम
अब भी मेरी हड्डियों के खण्डहर में
जैसे एक विषधर की गति से
आवर्तन करते हो

हर बार जब मैं
अलग करने लगती हूँ
तुम्हारी छवि को अपनी त्वचा से
वही अदृश्य दंश
मुझे नई व्याख्या की
दया-प्रार्थिनी बना देता है

अब यह देह
न तुम्हारी प्रतीक्षा में है
न प्रार्थना में
बस एक धीमी गलन में
तुम्हारी परछाई की
अभिशप्त गृहस्थी है।

शून्यबिंदु की साधना  

मैं अब तुम्हारे स्पंद को
जैसे था, वैसे ही
अपने नाभिस्थल में प्रतिष्ठित करती हूँ
न पीड़ा के रूप में
न प्रेम के
बस एक अवशिष्ट ताप की तरह
जो अब मेरी साधना का अग्रलेख बन चुका है

तुम्हारी स्मृति को शिराओं में
एक शांत ग्रन्थि रच कर रखती हूँ
न वह असह्य है,
न सुलभ
बस एक असमाप्त कम्प की भाँति
मेरे भीतर के शून्य को स्वर देती है

मैंने अपनी पीठ पर उगे
सारे अदृश्य विद्राव
अब पुष्पों की तरह सँजो लिए हैं
वे न अब धधकते हैं
न झुलसाते हैं
बस एक वलय में
मेरे कंठ के चारों ओर
आभा रचते हैं

मैंने जाना है
जिससे मुक्ति संभव न हो
उससे युति कर लेना ही
मौन की पूर्णता है

तुम्हारे आघातों से
मैंने अपने लिए
एक नया स्वर-स्पर्श खोजा है
जिसे कोई नहीं सुन सकता
पर हर रात
मेरी छाती के नीचे
जलता है
एक अस्फुट शिवत्व

अब जब भी
तुमसे लौटे क्षण आते हैं
मैं उन्हें ओढ़ नहीं लेती
केवल आँगन के तुलसी-चौरे पर
एक दीया अधिक रख देती हूँ।

दग्धवर्णा 

मैंने नहीं चाहा था
कि तुम्हें राग के अंतिम स्वर तक ले जाऊँ
पर प्रेम ने मुझे
उसी शिखा में रखा
जहाँ हर तान अंततः भस्म हो जाती है

अब मेरा गात
स्पर्श नहीं
केवल एक ज्वलंत रेखा रचता है
जो मौन में उतरती हुई
किसी असमाप्त अनुष्ठान की मुद्रिका बन जाती है

तुम्हारे उचाट आलिंगन के बाद
मेरे वस्त्रों की सलवटों में
कोई नमी नहीं रही
बस एक मृदु चटक
जो हर करवट पर
उखड़े मन्त्र की पुनरावृत्ति करती है

मेरे केशों में अब
अगरु-धूम्र है
और जूड़े के भीतर
कोई अधूरा वाक्य जलता रहता है

तुमने शायद प्रेम किया था
या केवल उसकी छाया में ठहरे थे
पर मैं उस छाया से
पूरा सूरज उगाना चाहती थी

अब मेरी दृष्टि
न तिरस्कार करती है
न स्वागत
बस एक क्षयवर्णी पीठ की तरह
मुँह मोड़ लेती है
और अग्नि की दिशा में चल पड़ती है

मैं प्रेम नहीं रही
प्रेम का पुरातत्त्व हूँ
जहाँ कभी किसी उन्माद ने
जल उठने का निर्णय लिया था।

पूर्वकम्पा 

कितना प्राचीन होगा वह क्षण
जब तुम्हारा नाम
मैंने पहली बार
अपनी हृदय-वीथिकाओं में सुना था
बिना उच्चारण
बिना संदर्भ

तब न प्रेम था
न उसके नकार की तैयारी
बस कोई अनाम सी झलक
जो मेरी कक्षा में उतर आई थी
जैसे कोहरे में
सूर्य नहीं
उसकी गंध आ जाए

तब न देह जागी थी
न अभिलाषा
पर कुछ था
जो दो हथेलियों के बीच
बाँधता था एक अगोचर पुल
जिस पर चलना
जैसे किसी प्राचीन ऋचा को दोहराना होता

मुझे नहीं पता था
कि यही अनुभव
एक दिन अग्नि बन जाएगा
पर तब वह केवल
एक झरती हुई बेल का प्रथम पत्ता था
जिसे गिरना नहीं आता था
और उड़ना नहीं आता था

अब,
जब मैं
अपनी आँखों की राख से
उन्हीं क्षणों को छूती हूँ
तो बस एक ही भावना उभरती है
कि प्रेम
शायद भूलने के लिए नहीं होता
बल्कि पहली बार समझने के लिए
जब सब जल चुका हो।

विलय की वंदना 

मैं अब तुम्हें
नाम से नहीं
किसी रेखा से नहीं
स्मरण करती
बल्कि एक ऐसी शांति से
जो अपने ही स्वरूप से
तुम्हें विसर्जित कर चुकी है

मेरे रुदन की आहुतियाँ
तुम्हारे लिए हैं 
दीप जलता है
लौ में तुम्हारा चेहरा देखती हूँ

पत्र लिखा जाता है
उस पते पर
जिसे कोई डाक कभी नहीं पढ़ती
केवल मेरे नाखूनों की धरा
उन अक्षरों की छाया से काँपती है

तुम अब
मेरे नेत्रों में नहीं
मेरे समर्पण की रेखा में हो
जहाँ हर भाव
एक चक्र की तरह
स्वयं को गलाता है
और अपनी अंतिम परिधि पर
तुम्हारा पवित्रतम अंश भी
एक अगम्य प्रकाश बन जाता है

मैंने तुम्हें
भूलने के लिए नहीं
पूर्णता में प्रविष्ट करने के लिए छोड़ा
जैसे नदी
न समुद्र माँगती है
न दिशा
बस विलीन हो जाना जानती है

विलीन 

तुम अब किसी दिशा में नहीं हो
न उत्तर
न उन मूलाधार रंगों में
जिन्हें तुम्हारे छूने से जीवन मिलता था
न ऋतुओं के भ्रम में

तुम अब समय के उस तंतु में हो
जो केवल आकाश जानता है
जहाँ कोई संबोधन नहीं पहुँचता
सिर्फ़ मौन की अन्त्याक्षरी बजती है

मैंने तुम्हारे विसर्जन को
जल में नहीं छोड़ा
न अग्नि में
मैंने उसे अपने अंतिम नेत्रांश में रोका
और फिर
निस्तब्धता के शिखर पर रख दिया

अब तुम
हर उगती किरण में अनाम हो
न तुम्हारा नाम है
न आकृति
फिर भी समस्त आभा
तुम्हारे स्मरण का परिवर्तित स्वरूप है

मैं अब तुम्हें
द्रष्टा की तरह नहीं
साधिका की तरह ग्रहण करती हूँ
जो हर आवर्तन में
तुम्हारे न होने को
एक नई उपस्थिति में संवर्धित करती है

तुम अब देह नहीं रहे
ना जल, ना ज्वाला
तुम अब केवल
व्योम के गूढ़तम आलोक में
एक स्थिर कंपन हो

और मैं
उस आलोक की छाया में
अपने नेत्र खोलती हूँ
जैसे कोई ऋषि
दीर्घकालिक मौन के पश्चात
अर्थ के आगे
मात्रा को प्रणाम करता है।

वंदना 

अब तुम्हारा अंश
मेरी चेतना की रंध्रों में
एक सुवासित निस्तब्धता रचता है
यह न अस्तित्व है,
न अनस्तित्व
यह वह वंदना है
जिसे उच्चारित नहीं किया जाता
केवल
झुककर जिया जाता है।

संपर्क : संपर्क : ए – 404शिवपूजा अपार्टमेंट, दत्त मंदिर मार्ग, शंकर कलात नगर, वाकड़, पिंपरी चिंचवड, पुणे (महाराष्ट्र) 411-057 ; 
मो. 9922822699 ; deepti.dbimpressions@gmail.com

4 Comments

  1. घनघोर प्रेम की कविताएं, जो उसकी हकीकत समझ कर भी उससे निकल नहीं पा रहीं, या निकलना चाहती ही नहीं! भाषा कमाल की है! जादुई होने तक खूबसूरत!

  2. दीप्ति जी का यह “प्रेम कविता ” संग्रह प्रेम के तात्विक विश्लेषण का एक शोध पत्र है…। जिसकी प्रत्येक पंक्ति
    का श्रृंगार उनकी अदभुत प्रतिभा ने किया है…।

  3. ओह..अप्रतिम
    यह प्रेम कविताएं ऐसी लग रही है मानो तप शिला पर प्रतिक्षा रत एक प्रेमिका जो पूर्ण रुप से समर्पित अपने प्रेम में डूब चुकी है…..उसे पा ली है सब कुछ निर्लिप्त,मौन …होकर भी बहुत कुछ है।

    🙏🏻🙏🏻💐💐🌹🌹

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